Section 13 Arbitration and Conciliation Act, 1996

  

Section 13  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Challenge procedure.—

(1) Subject to sub-section (4), the parties are free to agree on a procedure for challenging an arbitrator.

(2) Failing any agreement referred to in sub-section (1), a party who intends to challenge an arbitrator shall, within fifteen days after becoming aware of the constitution of the arbitral tribunal or after becoming aware of any circumstances referred to in sub-section (3) of section 12, send a written statement of the reasons for the challenge to the arbitral tribunal.

(3) Unless the arbitrator challenged under sub-section (2) withdraws from his office or the other party agrees to the challenge, the arbitral tribunal shall decide on the challenge.

(4) If a challenge under any procedure agreed upon by the parties or under the procedure under sub-section (2) is not successful, the arbitral tribunal shall continue the arbitral proceedings and make an arbitral award.

(5) Where an arbitral award is made under sub-section (4), the party challenging the arbitrator may make an application for setting aside such an arbitral award in accordance with section 34.

(6) Where an arbitral award is set aside on an application made under sub-section (5), the Court may decide as to whether the arbitrator who is challenged is entitled to any fees.



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 13  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

M/S Deep Trading Company vs M/S Indian Oil Corporation & Ors on 22 March, 2013

N.B.C.C.Ltd vs J.G.Engineering Pvt.Ltd on 5 January, 2010

Antrix Corp.Ltd vs Devas Multimedia P.Ltd on 10 May, 2013

Bharat Broadband Network Limited vs United Telecoms Limited on 16 April, 2019

Shailesh Dhairyawan vs Mohan Balkrishna Lulla on 16 October, 2015



माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 13 का विवरण : 

आक्षेप करने की प्रक्रिया-(1) उपधारा (4) के अधीन रहते हुए पक्षकार, किसी मध्यस्थ पर आक्षेप करने के लिए किसी प्रक्रिया पर करार करने के लिए स्वतंत्र हैं ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी करार के न होने पर, कोई पक्षकार, जो किसी मध्यस्थ पर आक्षेप करने का आशय रखता है, माध्यस्थम् अधिकरण के गठन से अवगत होने के पश्चात् या धारा 12 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट किन्हीं परिस्थितियों से अवगत होने के पश्चात् पन्द्रह दिन के भीतर माध्यस्थम् अधिकरण पर आक्षेप करने के कारणों का लिखित कथन भेजेगा ।

(3) जब तक कि वह मध्यस्थ, जिस पर उपधारा (2) के अधीन आक्षेप किया गया है, अपने पद से हट नहीं जाता है या अन्य पक्षकार आक्षेप से सहमत नहीं हो जाता है, माध्यस्थम् अधिकरण, आक्षेप पर विनिश्चय करेगा ।

(4) यदि पक्षकारों द्वारा करार पाई गई किसी प्रक्रिया के अधीन या उपधारा (2) के अधीन प्रक्रिया के अधीन कोई आक्षेप सफल नहीं होता है तो माध्यस्थम् अधिकरण, माध्यस्थम् कार्यवाहियों को चालू रखेगा और माध्यस्थम् पंचाट देगा ।

(5) जहां उपधारा (4) के अधीन कोई माध्यस्थम् पंचाट दिया जाता है वहां मध्यस्थ पर आक्षेप करने वाला पक्षकार, धारा 34 के अनुसार ऐसा माध्यस्थम् पंचाट अपास्त करने के लिए आवेदन कर सकेगा ।

(6) जहां कोई माध्यस्थम् पंचाट उपधारा (5) के अधीन किए गए आवेदन पर अपास्त किया जाता है वहां न्यायालय यह विनिश्चय कर सकेगा कि क्या वह मध्यस्थ, जिस पर आक्षेप किया गया है, किसी फीस का हकदार है ।



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