Section 12 Arbitration and Conciliation Act, 1996

  

Section 12  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Grounds for challenge.—

(1) When a person is approached in connection with his possible appointment as an arbitrator, he shall disclose in writing any circumstances likely to give rise to justifiable doubts as to his independence or impartiality.

(2) An arbitrator, from the time of his appointment and throughout the arbitral proceedings, shall, without delay, disclose to the parties in writing any circumstances referred to in sub-section (1) unless they have already been informed of them by him.

(3) An arbitrator may be challenged only if—

(a) circumstances exist that give rise to justifiable doubts as to his independence or impartiality, or

(b) he does not possess the qualifications agreed to by the parties.

(4) A party may challenge an arbitrator appointed by him, or in whose appointment he has participated, only for reasons of which he becomes aware after the appointment has been made.



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 12  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Central Organisation For Railway vs M/S Eci Spic Smo Mcml (Jv) A Joint on 17 December, 2019

Bharat Broadband Network Limited vs United Telecoms Limited on 16 April, 2019

M/S Duro Felguera S.A vs M/S. Gangavaram Port Limited on 10 October, 2017

Perkins Eastman Architects Dpc vs Hscc (India) Limited on 26 November, 2019

Ibi Consultancy India vs Dsc Ltd on 16 April, 2018

M/S. Silpi Industries vs Kerala State Road Transport on 29 June, 2021

N.B.C.C.Ltd vs J.G.Engineering Pvt.Ltd on 5 January, 2010




माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 12 का विवरण : 

आक्षेप के लिए आधार-(1) जहां किसी व्यक्ति से किसी मध्यस्थ के रूप में उसकी संभावित नियुक्ति के संबंध में प्रस्ताव किया जाता है वहां वह किसी ऐसी परिस्थिति को लिखित रूप में प्रकट करेगा जिससे उसकी स्वतंत्रता या निष्पक्षता के बारे में उचित शंकाएं उठने की संभावना हो ।

(2) कोई मध्यस्थ, अपनी नियुक्ति के समय से और संपूर्ण माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान, विलम्ब के बिना पक्षकारों को उपधारा (1) में निर्दिष्ट किन्हीं परिस्थितियों को लिखित रूप में तब प्रकट करेगा जब कि उसके द्वारा उनके बारे में पहले ही सूचित न कर दिया गया हो ।

(3) किसी मध्यस्थ पर केवल तभी आक्षेप किया जा सकेगा, यदि-

(क) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हों जो उसकी स्वतंत्रता या निष्पक्षता के बारे में उचित शंकाओं को उत्पन्न करती हों, या

(ख) उसके पास पक्षकारों द्वारा तय पाई गई अर्हताएं न हों ।

(4) कोई पक्षकार, ऐसे किसी मध्यस्थ पर, जो उसके द्वारा नियुक्त हो या जिसकी नियुक्ति में उसने भाग लिया हो, केवल उन कारणों से जिनसे वह नियुक्ति किए जाने के पश्चात् अवगत होता है, आक्षेप कर सकेगा ।



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