Section 11 Arbitration and Conciliation Act, 1996

 


Section 11  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Appointment of arbitrators. —

(1) A person of any nationality may be an arbitrator, unless otherwise agreed by the parties.

(2) Subject to sub-section (6), the parties are free to agree on a procedure for appointing the arbitrator or arbitrators.

(3) Failing any agreement referred to in sub-section (2), in an arbitration with three arbitrators, each party shall appoint one arbitrator, and the two appointed arbitrators shall appoint the third arbitrator who shall act as the presiding arbitrator.

(4) If the appointment procedure in sub-section (3) applies and—

(a) a party fails to appoint an arbitrator within thirty days from the receipt of a request to do so from the other party; or

(b) the two appointed arbitrators fail to agree on the third arbitrator within thirty days from the date of their appointment, the appointment shall be made, upon request of a party, by the Chief Justice or any person or institution designated by him.

(5) Failing any agreement referred to in sub-section (2), in an arbitration with a sole arbitrator, if the parties fail to agree on the arbitrator within thirty days from receipt of a request by one party from the other party to so agree the appointment shall be made, upon request of a party, by the Chief Justice or any person or institution designated by him.

(6) Where, under an appointment procedure agreed upon by the parties,—

(a) a party fails to act as required under that procedure; or

(b) the parties, or the two appointed arbitrators, fail to reach an agreement expected of them under that procedure; or

(c) a person, including an institution, fails to perform any function entrusted to him or it under that procedure, a party may request the Chief Justice or any person or institution designated by him to take the necessary measure, unless the agreement on the appointment procedure provides other means for securing the appointment.

(7) A decision on a matter entrusted by sub-section (4) or sub-section (5) or sub-section (6) to the Chief Justice or the person or institution designated by him is final.

(8) The Chief Justice or the person or institution designated by him, in appointing an arbitrator, shall have due regard to—

(a) any qualifications required of the arbitrator by the agreement of the parties; and

(b) other considerations as are likely to secure the appointment of an independent and impartial arbitrator.

(9) In the case of appointment of sole or third arbitrator in an international commercial arbitration, the Chief Justice of India or the person or institution designated by him may appoint an arbitrator of a nationality other than the nationalities of the parties where the parties belong to different nationalities.

(10) The Chief Justice may make such scheme 1 as he may deem appropriate for dealing with matters entrusted by sub-section (4) or sub-section (5) or sub-section (6) to him.

(11) Where more than one request has been made under sub-section (4) or sub-section (5) or sub-section (6) to the Chief Justices of different High Courts or their designates, the Chief Justice or his designate to whom the request has been first made under the relevant sub-section shall alone be competent to decide on the request.

(12) (a) Where the matters referred to in sub-sections (4), (5), (6), (7), (8) and (10) arise in an international commercial arbitration, the reference to ‘‘Chief Justice'' in those sub-sections shall be construed as a reference to the ‘‘Chief Justice of India''.

(b) Where the matters referred to in sub-sections (4), (5), (6), (7), (8) and (10) arise in any other arbitration, the reference to “Chief Justice” in those sub-sections shall be construed as a reference to the Chief Justice of the High Court within whose local limits the principal Civil Court referred to in clause (e) of sub-section (1) of section 2 is situate and, where the High Court itself is the Court referred to in that clause, to the Chief Justice of that High Court.



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 11  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Ramu Tiwari vs Mahendra & Mahendra Fiance Co.Ltd on 18 November, 2014

M/S Basai Steels And Power Pvt vs M/S Gobins India on 25 April, 2017

Gamesa Wind Turbines Pvt. Ltd, vs Mytrah Energy (India) Ltd on 27 December, 2017

Real Mazon Rajasthan Pvt Ltd vs The State Of Raj Thr Transport  on 12 April, 2019

Mr. Lokendra Pal Garg S/O Shri  vs Orient Green Power Company Ltd on 3 May, 2019



माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 का विवरण : 

मध्यस्थों की नियुक्ति-(1) किसी भी राष्ट्रिकता को कोई व्यक्ति, जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, मध्यस्थ हो सकता है ।

(2) उपधारा (6) के अधीन रहते हुए, पक्षकार मध्यस्थ या मध्यस्थों को नियुक्त करने के लिए किसी प्रक्रिया पर करार करने के लिए स्वतंत्र हैं ।

(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी करार के न होने पर, तीन मध्यस्थों वाले किसी मध्यस्थ में, प्रत्येक पक्षकार एक मध्यस्थ नियुक्त करेगा और दो नियुक्त मध्यस्थ ऐसे तीसरे मध्यस्थ को नियुक्त करेंगे, जो पीठासीन मध्यस्थ के रूप में कार्य करेगा ।

(4) यदि उपधारा (3) की नियुक्ति की प्रक्रिया लागू होती है और-

(क) कोई पक्षकार किसी मध्यस्थ को नियुक्त करने में, दूसरे पक्षकार से ऐसा करने के किसी अनुरोध की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर, असफल रहता है, या

(ख) दो नियुक्त मध्यस्थ अपनी नियुक्ति की तारीख से तीस दिन के भीतर तीसरे मध्यस्थ पर सहमत होने में असफल रहते हैं,तो नियुक्ति, किसी पक्षकार के अनुरोध पर, मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा या उसके द्वारा पदाभिहित किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा की जाएगी ।

(5) उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी करार के न होने पर, एकमात्र मध्यस्थ वाले किसी मध्यस्थ में, यदि पक्षकार किसी मध्यस्थ पर, एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार से किए गए किसी अनुरोध की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर इस प्रकार सहमत होने में असफल रहते हैं, तो नियुक्ति, किसी पक्षकार के अनुरोध पर मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा की  जाएगी ।

(6) जहां पक्षकारों द्वारा करार पाई गई किसी नियुक्ति की प्रक्रिया के अधीन,-

(क) कोई पक्षकार उस प्रक्रिया के अधीन अपेक्षित रूप में कार्य करने में असफल रहता है, या

(ख) पक्षकार अथवा दो नियुक्त मध्यस्थ, उस प्रक्रिया के अधीन उनसे अपेक्षित किसी करार पर पहुंचने में असफल रहते हैं, या

(ग) कोई व्यक्ित, जिसके अन्तर्गत कोई संस्था है, उस प्रक्रिया के अधीन उसे सौंपे गए किसी कृत्य का निष्पादन करने में असफल रहता है,वहां कोई पक्षकार, मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित किसी व्यक्ति या संस्था से, जब तक कि नियुक्ति प्रक्रिया के किसी करार में नियुक्ति सुनिश्चित कराने के अन्य साधनों के लिए उपबंध न किया गया हो, आवश्यक उपाय करने के लिए अनुरोध कर सकता है ।

(7) उपधारा (4) या उपधारा (5) या उपधारा (6) के अनुसार मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित व्यक्ति या संस्था को सौंपे गए किसी विषय पर कोई विनिश्चय अंतिम होगा ।

(8) किसी मध्यस्थ की नियुक्ति करने में मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित व्यक्ति या संस्था, निम्नलिखित का सम्यक् रूप से ध्यान रखेगी-

(क) पक्षकारों के करार द्वारा अपेक्षित मध्यस्थ की कोई अर्हता, और

(ख) अन्य बातें, जिनसे किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष मध्यस्थ की नियुक्ति सुनिश्चित किए जाने की संभावना है ।

(9) किसी अन्तरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में एकमात्र या तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति की दशा में, जहां पक्षकार विभिन्न राष्ट्रीयताओं के हैं वहां भारत का मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित व्यक्ति या संस्था, पक्षकारों की राष्ट्रीयता से भिन्न किसी राष्ट्रीयता वाला कोई मध्यस्थ नियुक्त कर सकेगी ।

(10) मुख्य न्यायमूर्ति, कोई ऐसी स्कीम बना सकेगा जो वह उपधारा (4) या उपधारा (5) या उपधारा (6) द्वारा उसे सौंपे गए विषयों के निपटारे के लिए समुचित समझे ।

(11) जहां विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायमूर्तियों या उनके पदाभिहितों से उपधारा (4) या उपधारा (5) या  उपधारा (6) के अधीन एक से अधिक बार अनुरोध किया गया है, वहां केवल वही मुख्य न्यायमूर्ति या उसका पदाभिहित ही, जिससे सुसंगत उपधारा के अधीन प्रथम बार अनुरोध किया गया है, ऐसे अनुरोध की बाबत विनिश्चय करने के लिए सक्षम होगा ।

(12) (क) जहां उपधारा (4), उपधारा (5), उपधारा (6), उपधारा (7), उपधारा (8) और उपधारा (10) में निर्दिष्ट विषय किसी अन्तरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में उद्भूत होते हैं वहां उन उपधाराओं में मुख्य न्यायमूर्ति" के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह भारत के मुख्य न्यायमूर्ति" के प्रति निर्देश है ।

(ख) जहां उपधारा (4), उपधारा (5), उपधारा (6), उपधारा (7), उपधारा (8) और उपधारा (10) में निर्दिष्ट विषय किसी अन्य माध्यस्थम् में उद्भूत होते हैं वहां उन उपधाराओं में मुख्य न्यायमूर्ति" के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह ऐसे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के प्रति निर्देश है जिसकी स्थानीय परिसीमाओं के भीतर धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ङ) में निर्दिष्ट प्रधान सिविल न्यायालय स्थित है और, जहां स्वयं उच्च न्यायालय ही उस खंड में निर्दिष्ट न्यायालय है, वहां उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के प्रति निर्देश है ।



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