Section 383 IPC in Hindi and English

 Section 383 IPC in Hindi and English



Section 383 of IPC 1860:- Extortion -

Whoever intentionally puts any person in fear of any injury to that person, or to any other, and thereby dishonestly induces the person so put in fear to deliver to any person any property or valuable security, or anything signed or sealed which may be converted into a valuable security, commits "extortion”.

Illustrations -

(a) A threatens to publish a defamatory libel concerning Z unless Z gives him money. He thus induces Z to give him money. A has committed extortion.

(b) A threatens Z that he will keep Z's child in wrongful confinement, unless Z will sign and deliver to A a promissory note binding Z to pay certain monies to A. Z signs and delivers the note. A has committed extortion.

(c) A threatens to send club-men to plough up Z's field unless Z will sign and deliver to B a bond binding Z under a penalty to deliver certain produce to B, and thereby induces Z to sign and deliver the bond. A has committed extortion.

(d) A, by putting Z in fear of grievous hurt, dishonestly induces Z to sign or affix his seal to a blank paper and deliver it to A. Z signs and delivers the paper to A. Here, as the paper so signed may be converted into a valuable security. A has committed extortion.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 383 of Indian Penal Code 1860:

Dr. Babu Ram Saksena vs The State on 5 May, 1950

Vikram Johar vs The State Of Uttar Pradesh on 26 April, 2019

Jeetu @ Jitendera & Ors vs State Of Chhattisgarh on 4 December, 2012

Vikram Singh @ Vicky & Anr vs Union Of India & Ors on 21 August, 2015

Dhananjay @ Dhananjay Kumar Singh vs State Of Bihar & Anr on 2 February, 2007

Raj Kumar @ Raju vs State Of Uttaranchal on 7 April, 2008

Ram Krishna Paul vs The Govt. Of West Bengal & Ors on 3 February, 1972

State Of Tamil Nadu vs State Of Kerala & Anr on 7 May, 2014

State Of Tamil Nadu vs State Of Kerala & Anr on 7 May, 1947

Romesh Chandra Arora vs The State on 6 October, 1959



आईपीसी, 1860 (भारतीय दंड संहिता) की धारा 383 का विवरण - उद्दापन -

जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उस व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को कोई क्षति करने के भय में साशय डालता है, और एतद्द्वारा इस प्रकार भय में डाले गए व्यक्ति को, कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई चीज, जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके, किसी व्यक्ति को परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करता है, वह “उद्दापन” करता है।

दृष्टांत -

(क) क यह धमकी देता है कि यदि य ने उसको धन नहीं दिया, तो वह य के बारे में मानहानिकारक अपमान लेख प्रकाशित करेगा। अपने को धन देने के लिए वह इस प्रकार य को उत्प्रेरित करता है। क ने उद्दापन किया है।

(ख) क, य को यह धमकी देता है कि यदि वह क को कुछ धन देने के संबंध में अपने आपको आबद्ध करने वाला एक वचनपत्र हस्ताक्षरित करके क को परिदत्त नहीं कर देता, तो वह य के शिशु को सदोष परिरोध में रखेगा य वचनपत्र हस्ताक्षरित करके परिदत्त कर देता है। क ने उद्दापन किया है।

(ग) क यह धमकी देता है कि यदि य, ख को कुछ उपज परिदत्त कराने के लिए शास्तियुक्त बन्धपत्र हस्ताक्षरित नहीं करेगा और ख को न देगा, तो वह य के खेत को जोत डालने के लिए लठैत भेज देगा और एतद्द्वारा य को वह बंधपत्र हस्ताक्षरित करने के लिए और परिदत्त करने के लिए उत्प्रेरित करता है। क ने उद्दापन किया है।

(घ) क, य को घोर उपहति करने के भय में डालकर बेईमानी से य को उत्प्रेरित करता है कि वह एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर कर दे या अपनी मुद्रा लगा दे और उसे क को परिदत्त कर दे य उस कागज पर हस्ताक्षर करके उसे क को परिदत्त कर देता है। यहां, इस प्रकार हस्ताक्षरित कागज मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सकता है, इसलिए क ने उद्दापन किया है।



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