क्षमादान

 क्षमादान

एक अपराधी के साथ अपराध करने में सहयोग करने वाले व्यक्ति को सह अपराधी कहते हैं। अपराधी को क्षमादान देने के विषय में सीआरपीसी की धारा 306 से 308 में वर्णन किया गया है। 

सेशन कोर्ट का मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट या विशेष न्यायाधीश या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट 7 वर्ष से अधिक कारावास तक के अपराध को क्षमा कर सकते हैं। यह समाधान  सह अपराधी को दिया जाता है।  क्षमा इस शर्त पर दी जाती है कि वह अपराध के संबंध में सभी जानकारियां कोर्ट को देगा| क्षमादान केवल सह अपराधी को गंभीर श्रेणी के अपराधों में दिया जाता है। 

सीआरपीसी की धारा 308 के अनुसार यदि कोई सह अपराधी क्षमादान की शर्तों का पालन नहीं करता है झूठी गवाही देता है तो कोर्ट उस पर झूठी गवाही देने का मुकदमा चला सकती है। कोट किसी भी अपराधी को इसलिए क्षमा करता है ताकि वास्तविक अपराधी बच ना सके अर्थात कोर्ट के सामने उस अपराधी का चेहरा आ सके जिसने अपराध करने में मुख्य भूमिका निभाई हो। इस को सरकारी गवाह बनाना भी कहा जाता है। कोर्ट यदि पाता है कि अभियुक्त ने क्षमादान की शर्तों का पालन किया है तो कोर्ट उस अपराधी को रिहा कर देता है। 

सीआरपीसी की धारा 320 में पक्षकारों के मध्य समझौता करने के प्रावधानों के बारे में उल्लेख किया गया है। धारा 320 के अनुसार किसी कार्रवाई में समझौता करने का अर्थ कोर्ट कार्रवाई को समाप्त कर देता है। कुछ अपराध ऐसे ही हैं जिसमें दोनों पक्ष कोर्ट की अनुमति के बिना भी समझौता कर सकते हैं। 

कुछ अपराध ऐसे हैं जिसमें पक्षकार कोर्ट की अनुमति से समझौता कर सकते हैं। यहां पर समझौते का अर्थ अपराधी या अभियुक्त को रिहा करना है। सीआरपीसी की धारा 323,324,325 में किए गए अपराधों को समझौते के माध्यम से निपटाया जा सकता है। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 के अनुसार उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद भी अपराधी अपने दर्द को कम करने के लिए या  क्षमा प्राप्त करने के लिए राष्ट्रपति से अपील कर सकता है। राष्ट्रपति मामले पर विचार करके अपराधी को क्षमा कर सकता है। राज्य के राज्यपाल को भी क्षमा करने की शक्ति प्राप्त है। लेकिन राज्यपाल सजा ए मौत की सजा को राष्ट्रपति की तरह क्षमा नहीं कर सकता| राज्यपाल सैनिक कोर्ट द्वारा दी गई सजा को माफ नहीं कर सकता। 

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