Section 188 IPC in Hindi and English

 Section 188 IPC in Hindi and English


Section 188 of IPC 1860:- Disobedience to order duly promulgated by public servant -

Whoever, knowing that, by an order promulgated by a public servant lawfully empowered to promulgate such order, he is directed to abstain from a certain act, or to take certain order with certain property in his possession or under his management, disobeys such direction,

shall, if such disobedience causes or tends to cause obstruction, annoyance or injury, or risk of obstruction, annoyance or injury, to any person lawfully employed, be, punished with simple imprisonment for a term which may extend to one month, or with fine which may extend to two hundred rupees, or with both;

and if such disobedience causes or trends to cause danger to human life, health or safety, or causes or tends to cause a riot or affray, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to six months, or with fine which may extend to one thousand rupees, or with both.


Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 188 of Indian Penal Code 1860:

Ajay Agarwal vs Union Of India And Ors on 5 May, 1993

C. Muniappan & Ors vs State Of Tamil Nadu on 30 August, 2010

India General Navigation And  vs Their Workmen on 14 October, 1959

Central Bank Of India vs Ram Narain on 12 October, 1954

State Of U.P vs Mata Bhikha And Others on 9 March, 1994

Municipal Council, Ratlam vs Vardichan And Ors. on 29 July, 1980

Re-Ramlila Maidan Incident Dt vs Home Secretary And Ors on 23 February, 2012

Municipal Council, Ratlam vs Shri Vardhichand & Ors on 29 July, 1980

Om Hemrajani vs State Of U.P. & Anr on 25 November, 2004

The State Of Maharashtra vs Sayyed Hassan Sayyed Subhan on 20 September, 2018



आईपीसी, 1860 (भारतीय दंड संहिता) की धारा 188 का विवरण -लोक-सेवक द्वारा सम्यक् रूप से प्रख्यापित आदेश की अवज्ञा -

जो कोई यह जानते हुए कि वह ऐसे लोक-सेवक द्वारा प्रख्यापित किसी आदेश से, जो ऐसे आदेश को प्रख्यापित करने के लिए विधिपूर्वक सशक्त है, कोई कार्य करने से विरत रहने के लिए या अपने कब्जे में की, या अपने प्रबन्धाधीन, किसी सम्पत्ति के बारे में कोई विशेष व्यवस्था करने के लिए निर्दिष्ट किया गया है, ऐसे निदेश की अवज्ञा करेगा,

यदि ऐसी अवज्ञा विधिपूर्वक नियोजित किन्हीं व्यक्तियों को बाधा, क्षोभ या क्षति, अथवा बाधा, क्षोभ या क्षति की जोखिम,कारित करे, या कारित करने की प्रवृत्ति रखती हो, तो वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो सौ रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से,दण्डित किया जाएगा,

और यदि ऐसी अवज्ञा मानव जीवन, स्वास्थ्य, या क्षेम को संकट कारित करे, या कारित करने की प्रवृत्ति रखती हो, या बल्वा या दंगा कारित करती हो, या कारित करने की प्रवृत्ति रखती हो, तो वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसके अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक हजार रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

स्पष्टीकरण - यह आवश्यक नहीं है कि अपराधी का आशय अपहानी उत्पन्न करने का हो या उसके ध्यान में यह हो कि उसकी अवज्ञा करने से अपहानी होना संभाव्य है। यह पर्याप्त है कि जिस आदेश की वह अवज्ञा करता है उस आदेश का उसे ज्ञान है, और यह भी ज्ञान है कि उसके अवज्ञा करने से अपहानी उत्पन्न होती या होनी संभाव्य है।



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