Section 67 Arbitration and Conciliation Act, 1996

 


Section 67  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Role of conciliator.—

(1) The conciliator shall assist the parties in an independent and impartial manner in their attempt to reach an amicable settlement of their dispute.

(2) The conciliator shall be guided by principles of objectivity, fairness and justice, giving consideration to, among other things, the rights and obligations of the parties, the usages of the trade concerned and the circumstances surrounding the dispute, including any previous business practices between the parties.

(3) The conciliator may conduct the conciliation proceedings in such a manner as he considers appropriate, taking into account the circumstances of the case, the wishes the parties may express, including any request by a party that the conciliator hear oral statements, and the need for a speedy settlement of the dispute.

(4) The conciliator may, at any stage of the conciliation proceedings, make proposals for a settlement of the dispute. Such proposals need not be in writing and need not be accompanied by a statement of the reasons therefor.



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 67  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Haresh Dayaram Thakur vs State Of Maharashtra And Ors on 5 May, 2000

Visa International Ltd vs Continental Resources (Usa)Ltd on 2 December, 2008


माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 67 का विवरण : 

सुलहकर्ता की भूमिका-(1) सुलहकर्ता, पक्षकारों की उनके विवाद के सोहार्द्रपूर्ण समझौते पर पहुंचने के उनके प्रयास में, स्वतंत्र और निष्पक्ष रीति से सहायता करेगा ।

(2) सुलहकर्ता, वस्तुनिष्ठा, औचित्य और न्याय के सिद्धांतों से मार्गदर्शित होगा जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ, पक्षकारों के अधिकारों और बाध्यताओं, संबंधित व्यापार की प्रथाओं और विवाद की परिवर्ती परिस्थितियों का, जिनमें पक्षकारों के बीच कोई पूर्ववर्ती कारबारी व्यवहार भी है, ध्यान रखा जाएगा ।

(3) सुलहकर्ता, सुलह कार्यवाहियों का संचालन ऐसी रीति से करेगा, जो वह समुचित समझे, जिसमें मामले की परिस्थितियां, वे इच्छाएं जो पक्षकार व्यक्त करे, जिसमें किसी पक्षकार का कोई ऐसा अनुरोध भी है कि सुलहकर्ता मौखिक कथन सुने और विवाद के शीघ्र निपटारे की आवश्यकता का ध्यान रखा जाएगा ।

(4) सुलहकर्ता, सुलह कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर विवाद के निपटारे के लिए प्रस्ताव तैयार कर सकेगा । ऐसे प्रस्तावों का लिखित में होना आवश्यक नहीं होगा और उसके लिए कारणों के किसी कथन का साथ होना आवश्यक नहीं होगा ।



To download this dhara / Section of  Arbitration and Conciliation Act, 1996 in pdf format use chrome web browser and use keys [Ctrl + P] and save as pdf.

Comments

Popular posts from this blog

संविधान की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख | Characteristics of the Constitution of India

100 Questions on Indian Constitution for UPSC 2020 Pre Exam

भारतीय संविधान से संबंधित 100 महत्वपूर्ण प्रश्न उतर