Section 57 Arbitration and Conciliation Act, 1996

  


Section 57  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Conditions for enforcement of foreign awards.—

(1) In order that a foreign award may be enforceable under this Chapter, it shall be necessary that—

(a) the award has been made in pursuance of a submission to arbitration which is valid under the law applicable thereto;

(b) the subject-matter of the award is capable of settlement by arbitration under the law of India;

(c) the award has been made by the arbitral tribunal provided for in the submission to arbitration or constituted in the manner agreed upon by the parties and in conformity with the law governing the arbitration procedure;

(d) the award has become final in the country in which it has been made, in the sense that it will not be considered as such if it is open to opposition or appeal or if it is proved that any proceedings for the purpose of contesting the validity of the award are pending;

(e) the enforcement of the award is not contrary to the public policy or the law of India. Explanation.—Without prejudice to the generality of clause (e), it is hereby declared, for the avoidance of any doubt, that an award is in conflict with the public policy of India if the making of the award was induced or affected by fraud or corruption.

(2) Even if the conditions laid down in sub-section (1) are fulfilled, enforcement of the award shall be refused if the Court is satisfied that—

(a) the award has been annulled in the country in which it was made;

(b) the party against whom it is sought to use the award was not given notice of the arbitration proceedings in sufficient time to enable him to present his case; or that, being under a legal incapacity, he was not properly represented;

(c) the award does not deal with the differences contemplated by or falling within the terms of the submission to arbitration or that it contains decisions on matters beyond the scope of the submission to arbitration: Provided that if the award has not covered all the differences submitted to the arbitral tribunal, the Court may, if it thinks fit, postpone such enforcement or grant it subject to such guarantee as the Court may decide.

(3) If the party against whom the award has been made proves that under the law governing the arbitration procedure there is a ground, other than the grounds referred to in clauses (a) and (c) of sub-section (1) and clauses (b) and (c) of sub-section (2) entitling him to contest the validity of the award, the Court may, if it thinks fit, either refuse enforcement of the award or adjourn the consideration thereof, giving such party a reasonable time within which to have the award annulled by the competent tribunal.




Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 57  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Gujarat Urja Vikash Nigam Ltd vs Essar Power Ltd on 13 March, 2008

National Highways Authority Of  vs Sayedabad Tea Co. Ltd. And Ors on 27 August, 2019

Cheran Propertiees Limited vs Kasturi And Sons Limited on 24 April, 2018

Yograj Infras.Ltd vs Ssang Yong Engineering &  on 1 September, 2011

State Of Goa vs M/S. Western Builders on 5 July, 2006

Visa International Ltd vs Continental Resources (Usa)Ltd on 2 December, 2008

Hindustan Copper Limited vs M/S Nicco Corporation Ltd on 5 September, 2008

Hindustan Copper Limited vs M/S Nicco Corporation Ltd on 20 May, 2008

Prakash Corporates vs Dee Vee Projects Limited on 14 February, 2022

M/S. Indtel Technical Services vs W.S. Atkins Plc on 25 August, 2008




माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 57 का विवरण : 

विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के लिए शर्तें-(1) इस वास्ते कि विदेशी पंचाट इस अध्याय के अधीन प्रवर्तनीय हो यह बात आवश्यक होगी कि-

(क) पंचाट उस माध्यस्थम् के निवेदन के अनुसरण में किया गया है जो उस विधि के अधीन विधिमान्य हो, जो उसे लागू है ;

(ख) पंचाट की विषयवस्तु ऐसी है जिसका भारत की विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा निपटारा किया जा सकता हो ;

(ग) पंचाट उस माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा किया गया हो जिसके बारे में माध्यस्थम् के निवेदन में उपबंध किया गया हो या जिसका गठन पक्षकारों द्वारा करार पाई गई रीति से हुआ है और उस विधि के अनुसार किया गया हो जो माध्यस्थम् प्रक्रिया के संबंध में लागू हो ;

(घ) पंचाट उस देश में, जिसमें उसे दिया गया है, इस अर्थ में अंतिम हो गया हो कि उस पर इस रूप में विचार नहीं किया जा सके यदि उसका विरोध करने या उसके विरुद्ध अपील करने की स्वतंत्रता है या यह साबित कर दिया जाता है कि पंचाट की विधिमान्यता को चुनौती देने के प्रयोजन के लिए कोई कार्यवाहियां लंबित हैं ;

(ङ) पंचाट का प्रवर्तन, भारत की लोक नीति या विधि के प्रतिकूल नहीं है ।

स्पष्टीकरण-खंड (ङ) की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किसी शंका को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि कोई पंचाट भारत की लोक नीति के विरुद्ध है यदि पंचाट का दिया जाना कपट या भ्रष्टाचार द्वारा उत्प्रेरित या प्रभावित किया गया था ।

(2) यदि उपधारा (1) में अधिकथित शर्तें भी पूरी कर दी जाती हैं तो भी पंचाट के प्रवर्तन से इंकार किया जा सकता है यदि न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि-

(क) पंचाट जिस देश में दिया गया था, वहां उसे बातिल किया जा चुका है, या

(ख) जिस पक्षकार के विरुद्ध उस पंचाट को प्रवर्तित कराने का प्रयास है, उसे माध्यस्थम् कार्यवाहियों की सूचना इतने समय पूर्व नहीं दी गई थी कि वह अपना पक्षकथन प्रस्तुत कर सकता अथवा किसी विधिक असमर्थता से ग्रस्त होने से उसका प्रतिनिधित्व उचित प्रकार से नहीं हुआ था, या

(ग) पंचाट ऐसे मतभेदों से संबंधित नहीं है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदित निबंधनों द्वारा अनुध्यात थे या उसके अन्तर्गत आते थे या उसमें ऐसी बातों के बारे में विनिश्चय है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदित विषय-क्षेत्र के बाहर है :

परन्तु यदि उस पंचाट में माध्यस्थम् अधिकरण को निवेदित सभी मतभेदों का समावेश नहीं किया गया है तो न्यायालय, यदि उचित समझता है तो वह या तो उसके प्रवर्तन को स्थगित कर सकेगा या, ऐसी प्रतिभूति के दिए जाने की शर्त पर जैसा कि न्यायालय निश्चित करे, उसका प्रवर्तन किए जाने की मंजूरी दे सकेगा ।

(3) यदि वह पक्षकार जिसके विरुद्ध पंचाट किया गया है, यह साबित कर देता है कि माध्यस्थम् प्रक्रिया को शासित करने वाली विधि के अधीन, उपधारा (1) के खंड (क) और (ग) तथा उपधारा (2) के खंड (ख) और (ग) में निर्दिष्ट आधारों से भिन्न ऐसा कोई आधार है, जिससे वह उस पंचाट की विधिमान्यता विवादास्पद करने का हकदार है तो न्यायालय, यदि वह ठीक समझे तो ऐसे पक्षकार को उतना युक्तियुक्त समय देते हुए जिसके भीतर कि सक्षम अधिकरण पंचाट को बातिल कर सकेगा, उस पंचाट को प्रवर्तित करने से इंकार कर सकेगा या उस पर विचार करना स्थगित कर सकेगा ।



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