जीविकोपार्जन का अधिकार | Right to Livelihood

जीविकोपार्जन का  अधिकार- यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या जीविकोपार्जन का  अधिकार (right to livelihood) अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में सम्मिलित हैं? यद्यपि अनुच्छेद 21 में इसका स्पष्ट एवं अभिव्यक्त रूप से उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन शीर्षस्थ न्यायालय के न्यायिक निर्णयों में अब यह माना जाने लगा है कि जीविकोपार्जन का अधिकार अनुच्छेद 21 में सम्मिलित है।
कंजूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (ए आई आर 1995 एससीआर 1995 एस सी 922) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा आजीविका के बेहतर साधन उपलब्ध कराने को अनुच्छेद 21 का एक अंग माना गया है सौदान सिंह बनाम नगर निगम नई दिल्ली (ए आई आर 1989 एससी 1988) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने आजीविका उपार्जन के अधिकार को यद्यपि स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मूल अधिकार नहीं माना है लेकिन अनुच्छेद 19 (1) (छ) के अंतर्गत इसे मूल अधिकार मानते हुए यह अवश्य कहा गया है कि यदि फुटपाथोंह एवं सड़कों पर आवागमन में व्यवधान पैदा किए बिना तथा शांति एवं व्यवस्था बनाए रखते हुए यदि कोई व्यक्ति अपनी आजीविका कमाता है तो राज्य को उसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
ऐसा ही एक और महत्वपूर्ण मामला ओलगा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम (ए आई आर 1986 एस सी 180) का है। इसमें उच्चतम न्यायालय ने आजीविका अर्थात जीविकोपार्जन के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का एक अंग माना है, लेकिन यह अवश्य कहा है कि फुटपाथों, पटरियों एवं सार्वजनिक मार्गों में व्यवधान पैदा करने वाला आजीविका अधिकार इसमें सम्मिलित नहीं है।
सुभाष कुमार बनाम स्टेट ऑफ़ बिहार (ए आई आर 1991 एस सी 420) तथा दिल्ली डेवलपमेंट हार्टिकल्चर एंप्लाइज यूनियन बनाम दिल्ली प्रशासन [(1942) 4 एस सी सी 99] के मामलों में उच्चतम न्यायालय ने जीविकोपार्जन के अधिकार को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत माना है। मारुति श्रीपति दुबल बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र (1987 कि. लाज. 743) का मामला भी इसी मत की पुष्टि करता है।
स्वच्छ सुनवाई एवं शीघ्र विचारण का अधिकार- बदलते परिवेश में हमारे शीर्षस्थ न्यायालय ने स्वच्छ विचारण तथा त्वरित विचारण को भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में सम्मिलित मान लिया है।  स्टेट बनाम मकसूदन सिंह (ए आई आर 1986 पटना 38) के मामले में पटना उच्च न्यायालय द्वारा यह कहा गया है कि प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तार अब मामलों के त्वरित विचारण तक हो गया है।
रतिराम बनाम स्टेट ऑफ़ मध्य प्रदेश (ए आई आर 2012 एस सी 1485) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि आपराधिक मामलों का ऋजु विचारण अपराधिक विधि शास्त्र की आत्मा है। ऐसे विचारण में प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का ध्यान रखा जाना चाहिए। न्यायालय को यह समाधान कर लेना चाहिए कि अभियुक्त के साथ अन्याय तो नहीं हुआ है। अनुच्छेद 21 का भी यही लक्ष्य है( fair trial is heart of criminal jurisprudence. )
संतोष डे बनाम अर्चना  गुहा (ए आई आर 1994 एस सी 1229) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने एक मामले के विचारण में लगे 14 वर्ष के समय को अनावश्यक एवं अत्यधिक विलंब मानते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का अतिक्रमण माना है।
इसी प्रकार पुलिस आयुक्त दिल्ली बनाम रजिस्ट्रार दिल्ली उच्च न्यायालय (ए आई आर 1997 एस सी 95)) के मामले में भी उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि मामलों का उचित एवं त्वरित विचारण न्याय प्रशासन की एक अहम आवश्यकता है।
विनीत नारायण बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (ए आई आर 1998 ऐसी 889) के मामले में तो उच्चतम न्यायालय द्वारा यहां तक कहा गया है कि न्यायपूर्ण विचारण के लिए यह भी आवश्यक है कि जहां अभियुक्त के हितों की  सुरक्षा एवं लोकहित में अपेक्षित हो वहां मामलों की सुनवाई बंद कमरे में की जानी चाहिए। उपरोक्त विवेचन से न्याय की इन महत्वपूर्ण सिद्धांतों की पुष्टि होती है कि-
क. विलंब न्याय को विफल कर देता है, तथा
ख. न्याय किया ही नहीं जाना चाहिए बल्कि किया गया दिखना चाहिए।
यह उचित नहीं है कि मामले वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा में अटके रहे तथा अभियुक्त की गर्दन पर अभियोजन की तलवार लटकी रहे।
निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार- अब निःशुल्क विधिक सहायता के अधिकार को भी संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का एक अंग माना जाने लगा है। यद्यपि निःशुल्क विधिक सहायता को संविधान के अनुच्छेद 21 में स्थान नहीं देकर अनुच्छेद 39 क ( राज्य की नीति के निदेशक तत्वों) में स्थान दिया गया है लेकिन न्यायिक निर्णयों में इसे मूल अधिकार का सा स्थान प्रदान किया गया है।
एम. एच. हाॅसकट  बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र (एआईआर 1978 एस सी 1548) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि निर्धन व्यक्ति को निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराना राज्य का कर्तव्य है, अनुकंपा नहीं। हुस्न आरा खातून बनाम स्टेट ऑफ़ बिहार (ए आई आर 1979) एस सी 1360) तथा सुकदास बनाम यूनियन टेरिटरी ओप्पो अरुणाचल [(1986) 2 एस सी सी के 401] के मामलों में भी इस अधिकार की पुष्टि की गई है।
मोहम्मद हुसैन उर्फ जुल्फिकार अली बनाम स्टेट (ए आई आर 2012 एस सी 750) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि - अभियुक्त को अधिवक्ता की सहायता उपलब्ध नहीं कराना विधि की सही प्रक्रिया का उल्लंघन है। अधिवक्ता की सहायता के बिना अभियुक्त को मृत्युदंड देना संविधान के अनुच्छेद 21 एवं 22 (1) का अतिक्रमण है।
विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया- यहां यह उल्लेखनीय है कि प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का  अधिकार अबाध नहीं है।  इस अधिकार को विधि द्वारा विहित प्रक्रिया द्वारा अल्पी कृत या छीना जा सकता है। अर्थात किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा विहित प्रक्रिया से प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। शब्द विधि द्वारा विहित प्रक्रिया अमेरिका के संविधान में प्रयुक्त शब्द सम्यक विधि प्रक्रिया के समान है।
लेकिन ऐसी विधि का युक्ति युक्त एवं नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल होना आवश्यक है। किसी भी व्यक्ति को मनमानी विधि द्वारा इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। 'ए. के. गोपालन बनाम स्टेट ऑफ़ मद्रास' (ए आई आर 1952 एस सी 27) के मामले में इसकी पुष्टि करते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा यह कहा गया है कि- विधि द्वारा विहित प्रक्रिया युक्तियुक्त, न्याय पूर्ण एवं नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल होनी चाहिए।

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