पृथक्करणीयता का सिद्धांत | Doctrine of Severability

प्रश्न - पृथक्करणीयता का सिद्धांत क्या है?
what is the the doctrine of severability?
उत्तर-- जब किसी संविधि या अधिनियम के ऐसे भागों को जो अवैध या संविधान के  उपबंधों से असंगत हो, वैध भागों से, विधानमंडल के आशय या अधिनियम के उद्देश्यों को समाप्त किए बिना अलग किए जा सकते हो तब उसे पृथक्करणीयता का सिद्धांत कहा जाता है इस सिद्धांत के अनुसार अधिनियम के वैध भागों को प्रवर्तित कर दिया जाता है और अवैध भाग अप्रवर्तनीय छोड़ दिए जाते हैं।
स्टेट ऑफ  बंबई बनाम एफ. एन. बलसारा (ए. आई. आर. 1951 एस. सी. 318) के मामले में यह कहा गया है कि बंबई प्रोहिबिशन एक्ट 1949 के कुछ भाग संवैधानिक उपबंधों से असंगत होने के कारण अपरिवर्तनीय है और शेष प्रवर्तनीय इन्हें आसानी से अलग किया जा सकता है।

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