Section 84 Negotiable Instruments Act, 1881

 

Section 84 Negotiable Instruments Act, 1881 in Hindi and English 


Section 84 Negotiable Instruments Act, 1881 :(1) Where a cheque is not presented for payment within a reasonable time of its issue, and the drawer or person on whose account it is drawn had the right, at the time when presentment ought to have been made, as between himself and the banker, to have the cheque paid and suffers actual damage through the delay; he is discharged to the extent of such damage, that is to say, to the extent to which such drawer or person is a creditor of the banker to a larger amount than he would have been if such cheque had been paid.

(2) In determining what is a reasonable time, regard shall be had to the nature of the instrument, the usage of trade and of bankers, and the facts of the particular case.

(3) The holder of the cheque as to which such drawer or person is so discharged shall be a creditor, in lieu of such drawer or person, of such banker to the extent of such discharge and entitled to recover the amount from him.

Illustrations

(a) A draws a cheque for Rs. 1,000, and, when the cheque ought to be presented, has funds at the bank to meet it. The bank fails before the cheque is presented. The drawer is discharged, but the holder can prove against the bank for the amount of the cheque.

(b) A draws a cheque at Ambala on a bank in Calcutta. The bank fails before the cheque could be presented in ordinary course. A is not discharged, for he has not suffered actual damage through any delay in presenting the cheque.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 84 of Negotiable Instruments Act, 1881 :

Shri Praflla Purushottam Gadge vs Buldhana Urban Co-Op. Credit on 30 November, 2017

Bombay High Court 

Prafulla Purushottam Gadge vs Buldana Urban Co-Operative on 30 November, 2017

Bombay High Court 

Prafulla Purushottam Gadge vs Buldana Urban Co-Operative  on 30 November, 2017

Bombay High Court

Prafulla Purushottam Gadge vs Buldana Urban Co-Operative on 30 November, 2017

Bombay High Court 

Haji Sheikh Hasanoo vs S. Natesa Mudaliar And Co. on 28 March, 1958

Bombay High Court 

Mohammed Ashraf vs The Director Of Agricultural on 7 August, 2019

Karnataka High Court 

Haji Sheikh Hasanoo vs S. Natesa Mudliar And Co. on 28 March, 1958

Bombay High Court 

Abdul Majid vs Ganesh Das Kalooram Ltd. And Anr. on 10 November, 1953

Orissa High Court 

Subanamma Ninan vs George Veeran on 18 September, 2020

Kerala High Court 

Sumitra Baluja vs Bharat Chemical Industries And  on 21 March, 1980

Delhi High Court



परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 84 का विवरण :  - (1) जहाँ कि चैक, उसके काटे जाने से युक्तियुक्त समय के अंदर संदाय के लिए उपस्थापित न किया जाए और जहाँ तक लेखीवाल या जिस व्यक्ति लेखे वह लिखा गया है उस व्यक्ति और बैंकार के बीच का सम्बन्ध है, वहाँ तक लेखीवाल या ऐसे व्यक्ति को उस समय, जबकि वह उपस्थापित किया जाना चाहिए था, यह अधिकार प्राप्त था कि चैक का संदाय किया जाए और वह विलम्ब के कारण वास्तव में नुकसान उठाता है वहाँ वह ऐसे नुकसान की मात्रा तक उन्मोचित हो जाता है, अर्थात् उस मात्रा तक जिस तक ऐसा लेखीवाल या व्यक्ति उस रकम से अधिक के लिए बैंकार का लेनदार है, जिस रकम का लेनदार वह होता यदि चैक का संदाय कर दिया गया होता ।

(2) यह अवधारण करने के लिए कि युक्तियुक्त समय क्या है लिखत की प्रकृति को, व्यापार और बैंकारों की प्रथा को और उस विशिष्ट मामले के तथ्यों को ध्यान में रखा जाएगा ।

(3) उस चैक का धारक, जिसकी बाबत् ऐसा लेखीवाल या व्यक्ति ऐसे उन्मोचित हो गया है, ऐसे लेखीवाल या व्यक्ति के बदले में ऐसे बैंकार का ऐसे उन्मोचन की मात्रा तक लेनदार और उससे उस रकम को वसूल करने का हकदार होगा ।

दृष्टान्त

(क) क 1,000 रुपये के लिए चैक लिखता है, और जब उपस्थापित किया जाना चाहिए था उस समय बैंक में उसके संदाय के लिए उसका रुपया है । चैक उपस्थापित किए जाने से पूर्व बैंक फैल हो जाता है । लेखीवाल उन्मोचित हो जाता है किन्तु धारक चैक की रकम के लिए बैंक के विरुद्ध अपना दावा साबित कर सकता है ।

(ख) क अम्बाले में एक चैक कलकत्ते के एक बैंक पर लिखता है । चैक के सम्यक्-अनुक्रम में उपस्थापित किए जाने से पूर्व बैंक फैल हो जाता है । क उन्मोचित नहीं होता क्योंकि चैक के उपस्थापित करने में किसी विलम्ब से उसे वास्तविक नुकसान नहीं उठाना पड़ा ।



To download this dhara / Section of Contract Act in pdf format use chrome web browser and use keys [Ctrl + P] and save as pdf.

Comments

Popular posts from this blog

संविधान की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख | Characteristics of the Constitution of India

भारतीय संविधान से संबंधित 100 महत्वपूर्ण प्रश्न उतर

संविधान के अनुच्छेद 19 में मूल अधिकार | Fundamental Right of Freedom in Article 19 of Constitution