Section 71 The Army Act, 1950

 

Section 71 The Army Act, 1950 in Hindi and English 



Section 71 The Army Act, 1950  :Punishments awardable by courts- martial. Punishments may be inflicted in respect of offences

committed by persons subject to this Act and convicted by courts- martial, according to the scale

following, that is to say,-

(a) death;

(b) transportation for life or for any period not less than seven years;

(c) imprisonment, either rigorous or simple, for any period not exceeding fourteen years;

(d) cashiering, in the case of officers;

(e) dismissal from the service;

(f) reduction to the ranks or to a lower rank or grade or place in the list of their rank, in the case of

warrant officers;

1. Explanation omitted by Act 13, of 1975, s. 3 (w. e. f. 15- 1- 1975 ).

and reduction to the ranks or to a lower rank or grade, in the case of non- commissioned officers:

Provided that a warrant officer reduced to the ranks shall not be required to serve in the ranks as a

sepoy;

(g) forfeiture of seniority of rank, in the case of officers, junior commissioned officers, warrant officers

and noncommissioned officers; and forfeiture of all or any part of their service for the purpose of

promotion, in the case of any of them whose promotion depends upon length of service;

(h) forfeiture of service for the purpose of increased pay, pension or any other prescribed purpose;

(i) severe reprimand or reprimand, in the case of officers, junior commissioned officers, warrant

officers and noncommissioned officers;

(j) forfeiture of pay and allowances for a period not exceeding three months for an offence committed

on active service;

(k) forfeiture in the case of a person sentenced to cashiering or dismissal from the service of all

arrears of pay and allowances and other public money due to him at the time of such cashiering or

dismissal;

(l) stoppage of pay and allowances until any proved loss or damage occasioned by the offence of

which he is convicted is made good.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 71 of The Army Act, 1950  :

Union Of India And Anr vs P.O. Yadav on 16 October, 2001

Union Of India vs S.S.Bedi on 29 July, 2020

Union Of India & Ors vs Bodupalli Gopalaswami on 12 September, 2011

U.O.I. & Ors vs Harjeet Singh Sandhu on 11 April, 2001

Union Of India & Ors vs Brg. P.K. Dutta (Retd.) on 7 December, 1994

Ex. Naik Sardar Singh vs Union Of India And Others on 3 May, 1991

Sanjay Marutirao Patil vs Union Of India Ministry Of Defence on 24 January, 2020

Union Of India And Ors vs Subedar Ram Narain Etc on 15 September, 1998

Ram Narayan Tiwari vs Union Of India & Ors on 21 February, 2011

State Of Haryana vs Balwant Singh on 4 March, 2003



सेना अधिनियम, 1950 की धारा 71 का विवरण :  - सेना-न्यायालयों द्वारा अधिनिर्णेय दण्ड - इस अधिनियम के अध्यधीन के व्यक्तियों द्वारा, जो सेना-न्यायालयों द्वारा सिद्धदोष ठहराए गए हैं, किए गए अपरोधों के बारे में दण्ड निम्नलिखित मापमान के अनुसार दिए जा सकेंगे, अर्थात्:

(क) मृत्यु;

(ख) आजीवन या सात वर्ष से अन्यून की किसी कालावधि के लिए निर्वासन;

(ग) चौदह वर्ष से अनधिक की किसी कालावधि के लिए, कठिन या सादा कारावास,

(घ) आफिसरों की दशा में सकलंक पदच्युत किया जाना;

(ङ) सेना से पदच्युति;

(च) वारण्ट आफिसरों की दशा में, सामान्य सैनिकों में या निम्नतर रैंक या श्रेणी में या उनके रैंक की सूची में के किसी निम्नतर स्थान पर अवनत कर देना, और अनायुक्त आफिसरों की दशा में सामान्य सैनिकों में या किसी निम्नतर रैंक या श्रेणी में अवनत कर देना;

परन्तु सामान्य सैनिकों में अवनत किए गए वारण्ट आफिसर से सामान्य सैनिकों में सिपाही के रूप में सेवा करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी;

(छ) आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों, वारण्ट आफिसरों और अनायुक्त आफिसरों की दशा में, रैंक में की ज्येष्ठता का समपहरण, तथा उनमें से किसी ऐसे की दशा में जिसकी प्रोन्नति सेवाकाल की लम्बाई पर निर्भर है उसके सेवाकाल का इसलिए पूर्णतः या भागतः समपहरण कि वह प्रोन्नति के प्रयोजन के लिए न गिनी जाए:

(ज) सेवाकाल का इसलिए समपहरण कि वह वेतन वृद्धि, पेंशन या किसी अन्य विहित प्रयोजन के लिए न गिना जाए;

(झ) आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों, वारण्ट आफिसरों और अनायुक्त आफिसरों, की दशा में तीव्र-धिग्दण्ड या धिग्दण्ड;

(ञ) सक्रिय सेवा के दौरान किए गए किसी अपराध के लिए तीन मास से अनधिक की कालावधि के लिए वेतन और भत्तों का समहपरण;

(ट) सकलंक पदच्युत किए जाने से या सेवा से पदच्युति से दण्डित व्यक्ति की दशा में वेतन और भत्तों के उन सब बकायों और अन्य लोक धन का समपहरण, जो ऐसे सकलंक पदच्युत किए जाने के या ऐसी पदच्युति के समय उसको शोध्य हों;

(ठ) वेतन और भत्तों का तब तक के लिए रोक दिया जाना जब तक उस साबित हुई हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति न हो जाए जो उस अपराध के कारण हुआ है जिसका वह सिद्धदोष ठहराया गया है।



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