Section 43 Negotiable Instruments Act, 1881

 


Section 43 Negotiable Instruments Act, 1881 in Hindi and English 


Section 43 Negotiable Instruments Act, 1881 :A negotiable instrument made, drawn, accepted, indorsed, or transferred without consideration, or for a consideration which fails, creates no obligation of payment between the parties to the transaction. But if any such party has transferred the instrument with or without indorsement to a holder for consideration, such holder, and every subsequent holder deriving title from him, may recover the amount due on such instrument from the transferor for consideration or any prior party thereto.

Exception 1 -- No party for whose accommodation a negotiable instrument has been made, drawn, accepted or indorsed can, if he has paid the amount thereof, recover thereon such amount from any person who became a party to such instrument for his accommodation.

Exception II - No party to the instrument who has induced any other party to make, draw, accept, indorse or transfer the same to him for a consideration which he has failed to pay or perform in full shall recover thereon an amount exceeding the value of the consideration (if any) which he has actually paid or performed.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 43 of Negotiable Instruments Act, 1881 :

M/S. Sunil Enterorises & Anr vs Sbi Commercial & International on 30 April, 1998

Vishnu Dutt Sharma vs Daya Sapra on 5 May, 2009

M/S. Sunil Enterorises & Anr vs Sbi Commercial & on 30 April, 1998



परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 43 का विवरण :  - प्रतिफल के बिना, या ऐसे प्रतिफल के लिए, जो निष्फल हो जाता है, रचित, लिखित, प्रतिगृहीत, पृष्ठांकित या अन्तरित परक्राम्य लिखत उस संव्यवहार के पक्षकारों के बीच संदाय को कोई बाध्यता सृष्ट नहीं करती । किन्तु यदि ऐसे किसी पक्षकार ने किसी प्रतिफलार्थ धारक को बह लिखत पृष्ठांकन सहित या रहित अन्तरित कर दी है तो ऐसा धारक और उससे हक व्युत्पन्न करने वाली हर पाश्चिक धारक ऐसी लिखत पर शोध्य रकम प्रतिफलार्थ अन्तरक से या उस लिखत के किसी भी पूर्विक पक्षकार से वसूल कर सकेगा ।

अपवाद I -- जिस पक्षकार के सौर्य के लिए परक्राम्य लिखत रची गई, लिखी गई, प्रतिगृहीत की गई या पृष्ठांकित की गई है, यदि उसने उसकी रकम का संदाय कर दिया है तो वह किसी भी ऐसे व्यक्ति से, जो उसके सौकर्य के लिए ऐसे लिखत का पक्षकार बना है, उस लिखत पर ऐसी रकम वसूल नहीं कर सकता ।

अपवाद II -- लिखत का कोई भी पक्षकार, जिससे किसी अन्य पक्षकार को ऐसे प्रतिफल के लिए, जिसे देने में या जिसका पूर्णतः पालन करने में वह असफल रहा है उसे अपने हक में रचने, लिखने, प्रतिगृहीत करने या पृष्ठांकित या अन्तरित करने के लिए उत्प्रेरित किया है, उस प्रतिफल के (यदि कोई हो) जो उसने वस्तुतः दिया है, या जिसका उसने वस्तुतः पालन किया है, मूल्य से अधिक रकम वसूल न करेगा ।



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