Section 35 The Army Act, 1950

 Section 35 The Army Act, 1950 in Hindi and English 



Section 35 The Army Act, 1950  :Offences in relation to the enemy and not punishable with death. Any person subject to this

Act who commits any of the following offences, that is to say,-

(a) is taken prisoner, by want of due precaution, or through disobedience of orders, or wilful neglect of

duty, or having been taken prisoner, fails to rejoin his service when able to do so; or

(b) without due authority holds correspondence with or communicates intelligence to the enemy or

having come by the knowledge of any such correspondence or communication, wilfully omits to

discover it immediately to his commanding or other superior officer; or

(c) without due authority sends a flag of truce to the enemy; shall, on conviction by court- martial, be

liable to suffer imprisonment for a term which may extend to fourteen years or such less punishment

as is in this Act mentioned.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 35 of The Army Act, 1950  :

Major E. G. Barsay vs The State Of Bombay on 24 April, 1961

Som Datt Datta vs Union Of India And Ors on 20 September, 1968

Joginder Singh vs State Of Himachal Pradesh on 30 November, 1970

Union Of India & Ors vs Sunil Kumar Sarkar on 28 February, 2001



सेना अधिनियम, 1950 की धारा 35 का विवरण :  -  शत्रु से संबंधित अपराध जो मृत्यु से दण्डनीय नहीं हैं - इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) सम्यक् पूर्वावधानी के अभाव से या आदेशों की अवज्ञा या कर्तव्य की जानबूझकर उपेक्षा के कारण कैदी बना लिया जाएगा या कैदी बना लिए जाने पर, तब जब वह अपनी सेवा पर वापस आ जाने में समर्थ है ऐसा करने में असफल रहेगा, अथवा

(ख) सम्यक् प्राधिकार के बिना शत्रु के साथ वार्ताचार करेगा या उसकी आसूचना देगा या ऐसे किसी वार्ताचार या आसूचना का ज्ञान प्राप्त होने पर उसे तुरन्त अपने कमान आफिसर या अन्य वरिष्ठ आफिसर से प्रकट करने का जानबूझकर लोप करेगा, अथवा

(ग) सम्यक् प्राधिकार के बिना शत्रु को अवहार ध्वज भेजेगा, सेना न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा।



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