Section 143 Negotiable Instruments Act, 1881

 

Section 143 Negotiable Instruments Act, 1881 in Hindi and English 



Section 143 Negotiable Instruments Act, 1881 :(1) Notwithstanding anything contained in the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974), all offenses under this Chapter shall be tried by a Judicial Magistrate of the first class or by a Metropolitan Magistrate and the provisions of sections 262 10 265 (both inclusive) of the said Code shall, as far as may be, apply to such trials :

Provided that in the case of any conviction in a summary trial under this section, it shall be lawful for the Magistrate to pass a sentence of imprisonment for a term not exceeding one year and an amount of fine exceeding five thousand rupees :

Provided further that when at the commencement of, or in the course of, a summary trial under this section, it appears to the Magistrate that the nature of the case is such that a sentence of imprisonment for a terin exceeding one year may have to be passed or that it is, for any other reason, undesirable to try the case summarily. the Magistrate shall after hearing the parties, record an order to that effect and thereafter recall any witness who may have been examined and proceed to hear or rehear the case in the manner provided by the said Code.

(2) The trial of a case under this section shall. so far as practicable, consistently with the interests of justice, be continued from day to day until its conclusion, unless the Court finds the adjournment of the trial beyond the following day to be necessary for reasons to be recorded in writing.

(3) Every trial under this section shall be conducted as expeditiously as possible and an endeavor shall be made to conclude the trial within six months from the date of filing of the complaint.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 143 of Negotiable Instruments Act, 1881 :

M/S. Mandvi Co-Op Bank Ltd vs Nimesh B.Thakore on 11 January, 2010

In Re Expeditious Trial Of Cases vs On 11.10.2020 Which Was on 16 April, 2021

M/S Meters And Instruments vs Kanchan Mehta on 5 October, 2017

Indian Bank Association & Ors vs Union Of India & Anr on 21 January, 1947

Prakash Gupta vs Securities And Exchange Board Of on 23 July, 2021

P. Mohanraj vs M/S. Shah Brothers Ispat Pvt. Ltd. on 1 March, 2021

Damodar S.Prabhu vs Sayed Babalal H on 3 May, 2010

R. Vijayan vs Baby & Anr on 11 October, 2011

Securities And Exchange Board Of  vs Classic Credit Ltd. on 21 August, 2017



परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 143 का विवरण :  - (1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी इस अध्याय के अन्तर्गत सभी अपराधों का विचारण न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग या मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के द्वारा किया जाएगा, एवं जहाँ तक हो सके उक्त संहिता की धारा 262 से 265 (दोनों सम्मिलित) के उपबंधों का ऐसे विचारण पर प्रवृत्त होगा :

परन्तु इस धारा के अधीन संक्षिप्तत: विचारण में मजिस्ट्रेट के लिये यह विधिक होगा कि किसी दोषसिद्धि के प्रकरण में एक साल की अवधि से अनधिक कारावास की सजा और पाँच हजार रुपये से अधिक जुर्माना की राशि का दण्डादेश पारित करे :

परन्तु यह और कि जब प्रारंभ होने पर संक्षिप्तत: विचरण के दौरान इस धारा के अन्तर्गत मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि प्रकरण का सारभाव ऐसा है कि प्रकरण का संक्षिप्तत: विचारण अवांछनीय है, एक वर्ष से अधिक के कारावास की सजा पारित किये जाने के योग्य है, अथवा अन्य कोई कारण है, प्रकरण में मजिस्ट्रेट पक्षों को सुनने के पश्चात् उसके प्रभाव के लिये आदेश अभिलिखित कर एवं तत्पश्चात् किसी साक्षी को पुनः

आहूत करता है, जिसे परीक्षित किया गया है, तथा सुनवाई या पुन: सुनवाई के लिये अग्रसर होता है, जैसी कि उक्त संहिता के द्वारा उपबंधित है ।

(2) इस धारा के अधीन स्थायी तौर पर न्याय के हित में प्रकरण का विचारण जहाँ तक व्यवहार्य है, जब तक उसका निष्कर्ष न हो, दिन प्रतिदिन होगा । न्यायालय प्रकरण का विचारण अगला दिन से आगे के लिये स्थगन आवश्यक है, तो लिखित तौर पर ऐसे कारण को अभिलिखित करेगा ।

(3) इस धारा के अन्तर्गत प्रत्येक विचारण यथासंभव यथाशीघ्र नियमित होगा, एवं परिवाद प्रस्तुत करने की तिथि से छ: माह के अंदर विचारण का निष्कर्ष के लिये प्रयास किया जाएगा ।



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