Section 118 Negotiable Instruments Act, 1881

 

Section 118 Negotiable Instruments Act, 1881 in Hindi and English 



Section 118 Negotiable Instruments Act, 1881 :Until the contrary is proved, the following presumptions shall be made --

(a) of consideration — that every negotiable instrument was made or drawn for consideration, and that every such instrument, when it has been accepted, indorsed, negotiated or transferred, was accepted, indorsed. negotiated or transferred for consideration;

(b) as to date that every negotiable instrument bearing a date was made or drawn on such date;

(c) as to time of acceptance -- that every accepted bill of exchange was accepted within a reasonable time after its date and before its maturity;

(d) as to time of transfer — that every transfer of a negotiable instrument was made before its maturity;

(e) as to order of indorsements — that the indorsements appearing upon a negotiable instrument were made in the order in which they appear thereon:

(f) as to stamps – that a lost promissory note. bill of exchange or cheque was duly stamped;

(g) that holder is a holder in due course -- that the holder of a negotiable instrument is a holder in due course; provided that, where the instrument has been obtained from its lawful owner, or from any person in lawful custody thereof, by means of an offence or fraud, or has been obtained from the maker or acceptor thereof by means of an offence or fraud, or for unlawful consideration, the burden of proving that the holder is a holder in due course lies upon him.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 118 of Negotiable Instruments Act, 1881 :

Mallavarapu Kasivisweswara Rao vs Thadikonda Ramulu Firm & Ors on 16 May, 2008

Basalingappa vs Mudibasappa on 9 April, 2019

Bharat Barrel And Drum vs Amin Chand Payrelal on 18 February, 1999

Rangappa vs Sri Mohan on 7 May, 2010

Krishna Janardhan Bhat vs Dattatraya G. Hegde on 11 January, 2008

Vijay vs Laxman & Anr on 7 February, 2013

Kamala S vs Vidyadharan M.J. & Anr on 20 February, 2007

Uttam Ram vs Devinder Singh Hudan on 17 October, 2019

M.S. Narayana Menon @ Mani vs State Of Kerala & Anr on 4 July, 2006

K. Prakashan vs P.K. Surenderan on 10 October, 2007



परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 118 का विवरण :  - जब तक कि प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, निम्नलिखित उपधारणाएं की जाएंगी -

(क) प्रतिफल के विषय में -- यह कि हर परक्राम्य लिखत प्रतिफलार्थ रचित या लिखी गई थी और यह कि हर ऐसी लिखत जब प्रतिगृहीत, पृष्ठांकित, परक्रामित या अन्तरित हो चुकी हो, तब वह प्रतिफलार्थ, प्रतिगृहीत, पृष्ठांकित, परक्रामित या अन्र्तारित की गई थी;

(ख) तारीख के बारे में -- यह कि ऐसी हर परक्राम्य लिखत जिस पर तारीख पड़ी है, ऐसी तारीख को रचित या लिखी गई थी।

(ग) प्रतिग्रहण के समय के बारे में -- यह कि हर प्रतिगृहीत विनिमय-पत्र उसकी तारीख के पश्चात् युक्तियुक्त समय के अंदर और उसकी परिपक्वता के पूर्व प्रतिगृहीत किया गया था;

(घ) अन्तरण के समय के बारे में -- यह कि परक्राम्य लिखत का हर अन्तरण उसकी परिपक्वता के पूर्व किया गया था; 

(ङ) पृष्ठांकनों के क्रम के बारे में -- यह कि परक्राम्य लिखत पर विद्यमान पृष्ठांकन उस क्रम में किए गए थे जिसमें वे उस पर विद्यमान हैं;

(च) स्टाम्प के बारे में -- यह कि खोया गया बचन-पत्र, विनिमय–पत्र या चैक सम्यक् रूप से स्टाम्पित था;

(छ) यह कि धारक सम्यक्-अनुक्रम-धारक है -- यह कि परक्राम्य लिखत का धारक सम्यक् अनुक्रम-धारक है; परन्तु जहाँ कि लिखत उसके विधिपूर्ण स्वामी से या उसकी विधिपूर्ण अभिरक्षा रखने वाले किसी व्यक्ति से अपराध या कपट द्वारा अभिप्राप्त की गई अथवा उसके रचयिता या प्रतिगृहीता से अपराध या कपट द्वारा अभिप्राप्त या विधि विरुद्ध प्रतिफल के लिए अभिप्राप्त की गई है, वहाँ यह साबित करने का भार कि धारक सम्यक्-अनुक्रम-धारक है, उस पर है।



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