Section 141 CrPC


Section 141 CrPC in Hindi and English

Section 141 of CrPC 1973 :- 141. Procedure on order being made absolute and consequences of disobedience - (1) When an order has been made absolute under section 136 or section 138, the Magistrate shall give notice of the same to the person against whom the order was made and shall further require him to perform the act directed by the order within a time to be fixed in the notice and inform him that, in case of disobedience, he will be liable to the penalty provided by section 188 of the Indian Penal Code (45 of 1860).

(2) If such act is not performed within the time fixed, the Magistrate may cause it to be performed and may recover the costs of performing it, either by the sale of any building, goods or other property removed by his order, or by the distress and sale of any other movable property of such person within or without such Magistrate's local jurisdiction and if such other property is without such jurisdiction, the order shall authorise its attachment and sale when endorsed by the Magistrate within whose local jurisdiction the property to be attached is found.

(3) No suit shall lie in respect of anything done in good faith under this section.

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 141 of Criminal Procedure Code 1973:

Ramchandra Aggarwal And Anr vs State Of Uttar Pradesh & Anr on 5 May, 1966

Pandurang Chandrakant Mhatre & vs State Of Maharashtra on 8 October, 2009

Municipal Council, Ratlam vs Shri Vardhichand & Ors on 29 July, 1980

Akbar Sheikh & Ors vs State Of West Bengal on 5 May, 2009

Municipal Council, Ratlam vs Vardichan And Ors. on 29 July, 1980

Allauddin Mian & Ors. Sharif Mian & vs State Of Bihar on 13 April, 1989

Vidyacharan Shukla vs Khubchand Baghel And Others on 20 December, 1963

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 141 का विवरण :  -  141. आदेश अंतिम कर दिए जाने पर प्रक्रिया और उसकी अवज्ञा के परिणाम -- (1) जब धारा 136 या धारा 138 के अधीन आदेश अंतिम कर दिया जाता है तब मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को, जिसके विरुद्ध वह आदेश दिया गया है, उसकी सूचना देगा और उससे यह भी अपेक्षा करेगा कि वह उस आदेश द्वारा निदिष्ट कार्य इतने समय के अंदर करे, जितना सूचना में नियत किया जाएगा और उसे इत्तिला देगा कि अवज्ञा करने पर वह भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 188 द्वारा उपबंधित शास्ति का भागी होगा।

(2) यदि ऐसा कार्य नियत समय के अंदर नहीं किया जाता है तो मजिस्ट्रेट उसे करा सकता है और उसके किए जाने में हुए खर्चों को किसी भवन, माल या अन्य संपत्ति के, जो उसके आदेश द्वारा हटाई गई है, विक्रय द्वारा अथवा ऐसे मजिस्ट्रेट की स्थानीय अधिकारिता के अन्दर या बाहर स्थित उस व्यक्ति की अन्य जंगम संपत्ति के करस्थम और विक्रय द्वारा वसूल कर सकता है और यदि ऐसी अन्य संपत्ति ऐसी अधिकारिता के बाहर है तो उस आदेश से ऐसी कुर्की और विक्रय तब प्राधिकृत होगा जब वह उस मजिस्ट्रेट द्वारा पृष्ठांकित कर दिया जाता है जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर कुर्क की जाने वाली संपत्ति पाई जाती है।

(3) इस धारा के अधीन सद्भावपूर्वक की गई किसी बात के बारे में कोई वाद न होगा।

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