Section 99 IPC in Hindi

 Section 99 IPC in Hindi and English


Section 99 of IPC 1860:-  Acts against which there is no right of private defence -

There is no right of private defence against an act which does not reasonably cause the apprehension of death or of grievous hurt, if done, or attempted to be done, by a public servant acting in good faith under colour of his office, though that act, may not be strictly justifiable by law.

There is no right of private defence against an act which does not reasonably cause the apprehension of death or of grievous hurt, if done, or attempted to be done, by the direction of a public servant acting in good faith under colour of his office, though that direction may not be strictly justifiable by law.

There is no right of private defence in cases in which there is time to have recourse to the protection of the public authorities.

Extent to which the right may be exercised - The right of private defence in no case extends to the inflicting of more harm than it is necessary to inflict for the purpose of defence.

Explanation 1 - A person is not deprived of the right of private defence against an act done, or attempted to be done, by a public servant, as such, unless he knows or has reason to believe, that the person doing the act is such public servant.

Explanation 2 — A person is not deprived of the right of private defence against an act done, or attempted to be done, by the direction of a public servant, unless he knows, or has reason to believe, that the person doing the act is acting by such direction, or unless such person states the authority under which he acts, or if he has authority in writing, unless he produces such authority, if demanded.


Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 99 of Indian Penal Code 1860:

Bhanwar Singh & Ors vs State Of M.P on 16 May, 2008

State Of U.P vs Gajey Singh And Anr on 24 February, 2009

Jai Bhagwan And Others vs State Of Haryana on 9 February, 1999

Kesho Ram vs Delhi Administration on 3 April, 1974

Mohinder Pal Jolly vs State Of Punjab on 14 December, 1978

Arjun vs State Of Maharashtra on 3 May, 2012

Ravishwar Manjhi & Ors vs State Of Jharkhand on 12 December, 2008

Abdul Kadir And Ors. vs State Of Assam on 25 September, 1985

State Of U.P vs Niyamat & Ors on 14 April, 1987

Maguni Charan Pradhan vs State Of Orissa on 4 April, 1991


आईपीसी, 1860 (भारतीय दंड संहिता) की धारा 99 का विवरण - कार्य, जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है -

यदि कोई कार्य, जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक-सेवक द्वारा किया जाता है या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है तो उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह कार्य विधि अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो। 

यदि कोई कार्य, जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक-सेवक के निर्देश से किया जाता है, या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है, तो उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह निदेश विधि अनुसार सर्वथा न्यायनुमत न भी हो।

उन दशाओं में जिनमें संरक्षा के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त करने के लिए समय है, प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है।

इस अधिकार के प्रयोग का विस्तार - किसी दशा में भी प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार उतनी अपहानि से अधिक अपहानि करने पर नहीं है, जितनी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से करनी आवश्यक है।

स्पष्टीकरण 1 - कोई व्यक्ति किसी लोक-सेवक द्वारा ऐसे लोक-सेवक के नाते किए गए या किए जाने के लिए प्रयतित, कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होता, जबकि वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसा लोक-सेवक है।  

स्पष्टीकरण 2 - कोई व्यक्ति किसी लोक-सेवक के निदेश से किए गए, या किए जाने के लिए प्रयतित, किसी कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होता, जब तक कि वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो, कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसे निदेश से कार्य कर रहा है, या जब तक कि वह व्यक्ति उस प्राधिकार का कथन न कर दे, जिसके अधीन वह कार्य कर रहा है, या यदि उसके पास लिखित प्राधिकार है, तो जब तक कि वह ऐसे प्राधिकार को मांगे जाने पर पेश न कर दे।


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