Section 10 of Hindu Marriage Act in Hindi & English

 Section 10 HMA in Hindi and English / हिन्दू विवाह अधिनियम 1955



Section 10 of Hindu Marriage Act 1955 - 


Judicial separation -


(1) Either party to a marriage, whether solemnized before or after the commencement of this Act, may present a petition praying for a decree for judicial separation on any of the grounds specified in subsection (1) of section 13, and in the case of a wife also on any of the grounds specified in sub-section (2) thereof, as grounds on which a petition for divorce might have been presented.


(2) Where a decree for judicial separation has been passed, it shall no longer be obligatory for the petitioner to cohabit with the respondent, but the Court may, on the application by petition of either party and on being satisfied of the truth of the statements made in such petition, rescind the decree if it considers it just and reasonable to do so.


Supreme Court of India Important Judgments Related to Section 10 of Hindu Marriage Act 1955 : 


Lachman Utamchand Kiriplani vs Meena Alias Mota on 14 August, 1963

Guda Vijayalakshmi vs Guda Ramchandra Sekhara Sastry on 13 March, 1981

Chandra Mohini Srivastava vs Avinash Prasad Srivastava & Anr on 13 October, 1966

Hirachand Srinivas Managaonkar vs Sunanda on 20 March, 2001

Rohini Kumari vs Narendra Singh on 2 December, 1971

Sondur Gopal vs Sondur Rajini on 15 July, 2013

Manisha Tyagi vs Deepak Kumar on 10 February, 2010

G.V.N. Kameswara Rao vs G. Jabilli on 10 January, 2002

Lily Thomas, Etc. Etc vs Union Of India & Ors on 5 May, 2000

Naveen Kohli vs Neelu Kohli on 21 March, 2006


धारा 10 हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 का विवरण - 


न्यायिक पृथक्करण –


(1) विवाह के पक्षकारों में से कोई पक्षकार चाहे वह विवाह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व अनुष्ठापित हुआ हो चाहे पश्चात् जिला न्यायालय की धारा 13 की उपधारा (1) में और पत्नी की दशा में उसी उपधारा (2) के अधीन विनिर्दिष्ट आधारों में से किसी ऐसे आधार पर, जिस पर विवाह-विच्छेद के लिए अर्जी उपस्थापित की जा सकती थी न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए प्रार्थना करते हुए अर्जी उपस्थापित कर सकेगा।


(2) जहाँ कि न्यायिक पृथक्करण के लिये आज्ञप्ति दे दी गई है, वहाँ याचिकादाता आगे के लिये इस आभार के अधीन होगा कि प्रत्युत्तरदाता के साथ सहवास करे, किन्तु यदि न्यायालय दोनों में से किसी पक्षकार द्वारा याचिका द्वारा आवेदन पर ऐसी याचिका में किये गये कथनों की सत्यता के बारे में अपना समाधान हो जाने पर वैसा करना न्याय संगत और युक्तियुक्त समझे तो वह आज्ञप्ति का विखंडन कर सकेगा।


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