Some Questions and Answers on Civil Procedure Code in Hindi

Some Questions and Answers on Civil Procedure Code in Hindi

प्रश्न  :- दीवानी मुकदमे में मुद्दे क्या होते हैं ? 
उत्तर  :- मुद्दे विवाद में बिंदुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं | प्रत्येक मामले में प्रस्ताव को एक पक्ष निश्चय के साथ स्वीकार्यता है | और दूसरे पक्ष द्वारा उसी मुद्दे की विषय वस्तु को नकारा जाता है प्रत्येक मुकदमे में मुद्दों को अवश्य बनाना चाहिए |

प्रश्न :- मुद्दों को आकार देने का उद्देश्य क्या होता है ? 
उत्तर :-  इसका उद्देश्य विवाद पूर्ण बिंदुओं को सफाई और बारीकी से प्रस्तुत करना होता है | न्यायालय के निर्णय के संबंध में या अपेक्षा की जाती है कि जहां प्रत्येक मुद्दे को अलग से देखा जाएगा तथा प्रत्येक मुद्दे का न्यायालय द्वारा निर्णय अलग से दर्ज होगा |

प्रश्न  :- किसी दीवानी मुकदमे की सुनवाई कैसे होती है ? 
उत्तर  :-(क) मुद्दे के अस्पष्ट हो जाने के बाद न्यायालय पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए गए मुद्दों के संदर्भ में प्रासंगिक सबूत देता है |
(ख)  वादी के साक्ष्यों की जांच पहले होती है | वे प्रतिवादी के साक्ष्यों का अनुगमन करते हैं, किंतु जब किसी तथ्य विशेष के लिए यह आवश्यक है कि प्रतिवादी उसे प्रमाणित करें तो वह उस तथ्य के संबंध में पहले सबूत पेश करता है तथा उस बिंदु पर उसके साक्ष्य वादी के साक्ष्यों का अनुगमन करते हैं|
(ग) साक्ष्यों की जांच होने के बाद दोनों तरफ के तर्कों की सुनवाई होती है |

प्रश्न  : -   गवाहों को बुलाने का क्या तरीका है ? 
उत्तर :-  जिस दिन मुद्दे बनाए जाते हैं तब से 15 दिन के भीतर पक्षों को गवाहों की सूची न्यायालय में पेश करनी होती है जिन्हें गवाही के लिए बुलाया जाता है | जो पक्ष गवाहों को बुलाता है उसे उनके आने-जाने का व्यक्ति खर्चा कोर्ट में जमा करना होता है | न्यायालय जरुरी भत्ता दिलवा सकता है यदि गवाने कोई विशेषज्ञ का कार्य नहीं किया हो | और जहां पर पार्टी प्रत्यक्ष रूप से सामने गवा देती है तो वह यात्री किराया भत्ता भी स्वयं देता है |

प्रश्न :- क्या न्यायालय बिना बहस सुने भी निर्णय सुना सकती है ? 
उत्तर :- यदि जज बिना बहस सुने निर्णय देता है तो इस तरह की कानूनी कार्यवाही को सही नहीं माना जाता है | न्यायालय का पक्षों को सुनना जरूरी है | तथा पक्षों के द्वारा बहस सुनने के आवेदन को अपना निर्णय देने से पहले न्यायालय ठुकरा नहीं सकता है |

प्रश्न  : -   यदि  गवाह न्यायालय में पेश नहीं हो पाते हैं तो उनका परिणाम क्या होता है |
उत्तर :-  आमतौर से गवाह का यह कर्तव्य होता है कि वह निर्धारित समय तथा स्थान पर पहुंचे, यदि गवाह नहीं पहुंचता है और वह न्यायालय को अपनी असमर्थता के कारण से संतुष्ट नहीं कर पाता है तो उसे ₹500 तक का जुर्माना किया जा सकता है | यदि गवाह बंदी है या जेल में है तो न्यायालय संबंधित अधिकारी से उन्हें न्यायालय में गवाही के लिए प्रस्तुत होने के लिए कह सकता है |

प्रश्न : -  स्थगन आदेश क्या है ? न्यायालय की कार्यवाही को स्थगित करने की क्या प्रक्रिया है ? 
उत्तर :- कानून में इसका अर्थ है न्यायालय की कार्यवाही को स्थगित करके किसी अन्य दिन के लिए रखवा लेना | एडजस्टमेंट न्यायालय की इच्छा पर निर्भर करता है, जो उचित होना चाहिए | ऑर्डर 17 के अनुसार मुकदमे की किसी भी स्टेज पर एडजस्टमेंट का आवेदन किया जा सकता है | न्यायालय बार-बार एडजस्टमेंट मांगे जाने पर जुर्माना भी लगा सकता है |

प्रश्न   :- क्या वकील करना आवश्यक होता है ? 
उत्तर :- जी नहीं | कोई भी पक्ष न्यायालय में स्वयं उपस्थित हो सकता है तथा अपना मुकदमा स्वयं लड़ सकता है |

प्रश्न  :- मुकदमे की सुनवाई के समय यदि वादी उपस्थित ना हो तो मुकदमे का क्या होता है  ? 
उत्तर  :-) यदि पहली सुनवाई में वादी उपस्थित नहीं होता है तब मुकदमा खारिज हो जाता है परंतु वह न्यायालय कि यदि संतुष्टि कर सके तो मुकदमा दोबारा भी सुना जा सकता है |

प्रश्न  :-) यदि वादी कोर्ट फीस या पोस्टल चार्ज नहीं दे सके तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है ? 
उत्तर :- ऐसी स्थिति में न्यायालय संहिता के ऑर्डर 9 रूलर के अनुसार मुकदमे को खारिज करने का भी हुकुम दे सकती है |

प्रश्न :- ) यदि मुकदमे की कार्यवाही के दौरान कोई भी पक्ष हाजिर ना हो तो क्या हो सकता है ? 
उत्तर :- ऐसी स्थिति में न्यायालय मुकदमा खारिज करने का हुक्म दे सकती है परंतु न्यायालय को संतोषजनक कारण बता सकता है तो उसका मुकदमा दोबारा बहाल किया जा सकता है |

प्रश्न  :- मुकदमे की सुनवाई के समय यदि प्रतिवादी उपस्थित नहीं हो तो क्या स्थिति होती है ? 
उत्तर :- यदि प्रतिवादी न्यायालय में उपस्थित नहीं होता है उसकी अनुपस्थिति में सुनवाई की कार्यवाही की जा सकती है | उसे इस प्रकार कहना होगा कि मुकदमा एक तरफा चुना गया |
 — तथापि यदि प्रतिवादी उसके बाद न्यायालय को संतुष्ट कर सके की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान उसकी अनुपस्थिति व्याप्त कारणों के फल स्वरुप थी | फिर वह न्यायालय से इस आदेश के लिए आवेदन कर सकता है कि उसे कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति दी जाए |

प्रश्न  :- क्या कोई निर्णय एक तरफा दिया जा सकता है |
उत्तर :- हां यदि न्यायालय ने ऐसी आदेश दीया हो, की प्रतिवादी की अनुपस्थिति के कारण मामलों की एकतरफा कार्यवाही हो तो ऐसे आदेश के उपरांत न्यायालय एकतरफा फैसला की घोषणा कर सकता है, यदि निर्णय की स्थिति में रद्द किया जा सकता है यदि प्रतिवादी बाद में आवेदन करता है कि उसे इस आधार पर रोक दिया जाए कि :— (1) उसे सम्मन नहीं भेजे गए हैं या
(2) यद्यपि उसे सूचना भेजी गई थी, वह उपस्थिति नहीं हो सका और उसकी अनुपस्थिति व्याप्त कारणों से फल स्वरुप थी |

प्रश्न  :- समन भेजने की प्रक्रिया ? 
उत्तर :- मुकदमा दायर होने के बाद समन भेजे जाते हैं | यदि प्रतिवादी न्यायालय के क्षेत्राधिकार में रहते हैं तो न्यायालय का कोई अफसर समन पुस्तक पहुंचाएगा जिसमें मुकदमे यानी टैलेंट की कॉपी सलंगन होगी | यदि प्रतिवादी क्षेत्राधिकार से बाहर रहता है तो उसे स्पीड पोस्ट कोरियर के द्वारा सूचना दिया जाना आवश्यक है |

प्रश्न :- प्रतिवादी को कितने समय के भीतर लिखित जवाब देना होगा ? 
उत्तर :- समन मिलने के बाद 30 दिन के भीतर लिखित जवाब दाखिल करना जरूरी है किन्हीं विशेष परिस्थितियों में यह अवधि 90 दिन भी की जा सकती है परंतु यह छूट न्यायालय की इच्छा पर निर्भर करेगा कि वह यह छूट दे या नहीं |

प्रश्न  :-  जजमेंट की कॉपी लेने की न्यायालय में क्या प्रक्रिया है |
उत्तर :- पक्ष निर्णय होने के बाद एक निर्धारित फीस देने के बाद जजमेंट की कॉपी ले सकते हैं | आशीष हाईकोर्ट के नियमों द्वारा निर्धारित की जाती है |

प्रश्न :- न्यायालय में स्थगन से क्या मतलब है ? उसका क्या तरीका है ? 
उत्तर :- न्यायालय में स्थगन से तात्पर्य है — किसी मुकदमे की सुनवाई को टाल कर, अन्य दिन सुनवाई की जाए | मुकदमे का स्थगन न्यायालय की इच्छा पर निर्भर करता है जो न्यायालय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कोई आदेश देता है | मुकदमा स्थगन कराने के लिए कोई ठोस कारण बताना आवश्यक है | यदि कोई पक्ष बार-बार स्थगन की अगली देगा तो न्यायालय उसके विरुद्ध जुर्माना लगा सकती है |

प्रश्न 30 :- क्या कोई दीवानी न्यायालय मौखिक निर्णय दे सकता है ? 
उत्तर :- नहीं निर्णय लिखित रूप में होना चाहिए तथा उसमें उन सभी बिंदुओं का समावेश होना चाहिए जिन बिंदुओं और कारणों के परिणाम स्वरुप यह निर्णय किया गया है |

प्रश्न  :- निर्णय एवं डिक्री में क्या भेद है ? 
 उत्तर :- डिक्री निर्णय का औपचारिक हिस्सा होती है | निर्णय में उन कारणों को समाहित  आ जाता है जिनके आधार पर निर्णय लिया गया है |

प्रश्न  :- निष्पादन क्या होता है ? 
उत्तर :- निष्पादन कर आशय डिक्री का प्रत्यावर्तन करता है |

प्रश्न  :- निष्पादन के प्रमुख प्रकार क्या हैं?  
उत्तर क :- ) अचल संपत्ति का वापस दिलाने हेतु डिक्री के निष्पादन के लिए( कथा अधिकृत व्यक्ति को वे दखल करने के लिए) कब्जे को वापस दिलाने का कार्य न्यायालय के कर्मचारियों के माध्यम से प्रभावित होता है |
ख) धन की डिक्री का निष्पादन निर्णय दिन दान की संपत्ति को जप्त करने से प्रभावित हो जाती है | कुछ मामलों में वह डिक्री की निष्पादन में गिरफ्तार भी किया जा सकता है | फिर भी यहां उल्लेख किया जाना चाहिए कि धन डिक्री के निष्पादन में महिला गिरफ्तार नहीं की जा सकती |
ग) निष्पादन के दूसरे अन्य उपाय डिक्री की प्रकृति के आधार पर न्याय संगत हो सकते हैं |

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