Indian Federalism - परिसंघ सिद्धांत का भारतीय संस्करण

संविधान में कुछ ऐसी उपबंध हैं जो परिसंघ सिद्धांत से विचलन हैं| दूसरे प्रकार से कहें तो यह परिसंघ सिद्धांत का भारतीय संस्करण है|
(क) राजू टीवी एक संविधान| अमेरिकी संघ अनेक प्रभुत्व संपन्न राज्यों द्वारा स्वेच्छा से किए गए करार का परिणाम था| इसका उद्देश्य एक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना थी जो उनके समान हितों का पोषण करें| इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राज्यों ने अपने कुछ अधिकार त्याग दिए| कनाडा में प्रांतों का जन्म केंद्र के जन्म के पहले नहीं हुआ था| कनाडा के एक अधिनियम द्वारा प्रांतों को राज्य बनाकर उन्हें कुछ अधिकार प्रदान किए गए| परिसंघ अधिनियम द्वारा अधिरोपित था| राज्यों द्वारा स्वेच्छा से नहीं बनाया गया था|
भारत में 1935 के अधिनियम द्वारा स्वशासी इकाइयां बनाई गई और उन्हें परिसंघ के ढांचे में डाला गया| दोनों का सृजन एक ही अधिनियम से हुआ| या किसी संधि या करार का परिणाम नहीं था| हमारा संविधान भारत के लोगों द्वारा बनाया गया है| राज्यों द्वारा नहीं| यह करार का परिणाम नहीं है| संविधान सभा ने संघ और राज्य दोनों के लिए संविधान बनाया| 
(ख) भारत में एकल नागरिकता है| ऐसा ही कनाडा में है| इसके विपरीत अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में दोहरी नागरिकता है| राष्ट्रीय और राज्य की| अमेरिका में प्रत्येक अमरीकी नागरिक अमेरिका का नागरिक होने के साथ-साथ उस राज्य का नागरिक होता है जहां वह निवास करता है| उसकी निष्ठा दो सरकारों के प्रति होती है| वह दोनों के अधीन रहता है| भारत में दोहरी नागरिकता नहीं है| प्रत्येक नागरिक भारत का नागरिक होता है राज्य का नहीं|
(ग) अमेरिका के उच्चतम न्यायालय में वहां के गण तंत्र का वर्णन करते हुए यह कहा है कि वह और अविनाशी राज्यों द्वारा गठित अविनाशी संध है| इससे अभिप्राय है कि (1) राज्य जिला भोकर संघ को नष्ट कर सकते है| किसी राज्य को अधिकार नहीं है कि वह परिसंघ से बाहर निकल जाए और (2) परिसंघ सरकार को यह शक्ति नहीं है कि वह राज्यों की संख्या या उनका राज्य क्षेत्र घटा दे या बढ़ा दे| यह संबंध राज्य की सहमति से ही किया जा सकता है| ऑस्ट्रेलिया का संघवी अविनाशी है और राज्यों की सीमा में परिवर्तन के लिए जनमत संग्रह आवश्यक है|
भारत में संघ अविनाशी है किंतु राज्य नहीं| कोई राज्य विलग नहीं हो सकता| संघ राज्यों की सीमाएं बदल सकता है दो या अधिक राज्यों को मिलाकर या एक राज्य को विभाजित करके नया राज्य बना सकता है| संघ किसी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकता है| संघ को राज्यों के उत्पादन और सृजन में पूरी छूट है| पूर्व में हैदराबाद और मध्य भारत का उत्सादन किया गया है| असम का विभाजन करके मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि ने राज्य बनाए गए| भोपाल और अजमेर को उनके निकटवर्ती राज्य में मिला दिया गया| सन 2000 में 3 नए राज्य बने उत्तराखंड,  झारखंड और छत्तीसगढ़|
 राज्य क्षेत्र में परिवर्तन सामान्य विधान द्वारा किया जा सकता है| ऐसे विधान के लिए संसद में विशेष बहुमत की या राज्य की सहमति की अपेक्षा नहीं होती| ऐसी विधियों को संविधान का संशोधन नहीं माना जाता | राजीव को अपने राज्य क्षेत्र की अखंडता का कोई अधिकार नहीं है|
(घ) अनुच्छेद 245 और 246 द्वारा विधाई शक्ति का वितरण किया गया है| इस अनुसूची में तीन सूचियां हूं - संघ सूची ,राज्य सूची  और समवर्ती सूची| सभी अवशिष्ट शक्तियां संघ में निहित है| यदि केंद्रीय विधान मंडल समवर्ती सूची में उल्लिखित किसी विषय पर विधि बनाता है तो राज्य उतने क्षेत्र के भीतर जो केंद्र के  अंतर्गत है प्रवेश नहीं कर सकते| यदि कोई विषय किसी सूची में नहीं है तो उस विषय पर विधान बनाने का अधिकार केंद्र को है| इस प्रकार केंद्रीय सरकार को विधान बनाने की प्रबल शक्ति है|
(ङ) राज्यों की राज्य सूची में की प्रविष्टियों के संबंध में विधि बनाने की शक्ति ऐसी नहीं है कि उसका उल्लंघन ना किया जा सके| कुछ परिस्थितियों में संसद ऐसे विषयों पर विधान बना सकती है| यह निम्न परिस्थितियों हैं|
1. जहां राज्यसभा दो तिहाई बहुमत से संकल्प पारित करके संसद को किसी विषय पर विधि बनाने का प्राधिकार दे| ऐसा संकल्प 1 वर्ष से अधिक अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है किंतु उसे आगे के 1 वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है| समय का यह विस्तार चाहे जितनी बार किया जा सकता है| ऐसे संकल्प के आधार पर संसद द्वारा बनाई गई विधि संकल्प के प्रवृत्त ना रहने के पश्चात 6 माह की अवधि तक प्रभावी रहती है|
2. जहां अनुच्छेद 352 के अधीन आपात की उद्घोषणा की गई है वहां संसद को उद्घोषणा के आधार पर राज्य सूची में कि किसी प्रविष्ट की बाबत विधि बनाने की शक्ति मिल जाती है|
3. जहां दो या अधिक राज्यों के विधान मंडल, संकल्प द्वारा, संसद से राज्य सूची में सम्मिलित किसी विषय के संबंध में विधि पारित करने का आग्रह करते हैं| ऐसी विधि प्रारंभ में उन्हीं राज्यों पर लागू होती है जिन्होंने आग्रह किया था| अन्य राज्यों से अंगीकार कर सकते हैं| अनुच्छेद 252 के अधीन पारित अधिनियमों के कुछ उदाहरण है  पुरस्कार प्रतियोगिता अधिनियम 1955, नगर भूमि अधिनियम 1976, वन्य जीवन अधिनियम 1972, मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम 1994|
4. संसद अंतरराष्ट्रीय संधियों को प्रभावित करने के लिए विधि अधिनियमित कर सकती है  चाहे उनसे संबंधित विषय राज्य सूची में आते हों|
5. जब किसी राज्य में अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन अधिरोपित किया जाता है तो संसद को राज्य की विधाई शक्तियों का प्रयोग करने की शक्ति मिल जाती है| संसद या राष्ट्रपति द्वारा बनाई गई विधि तब तक प्रवृत्त रहती है जब तक कि राज्य विधान मंडल द्वारा वह परिवर्तित या निरसित ना की जाए|

(च) संघ को विधियों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए किसी भी राज्य को निर्देश देने की शक्ति है| ऐसे विदेशों का अनुपालन करने में असफल रहने पर राष्ट्रपति उस राज्य की सरकार के कृत्य अपने हाथ में ले सकते हैं (अनुच्छेद 365) वैसे ही जैसे कि अनुच्छेद 356 के अधीन होता है|
(छ) राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है| वह राज्य के प्रति उत्तरदाई नहीं होता| केंद्र उस के माध्यम से राज्य पर कुछ मात्रा में नियंत्रण रखता है( अनु.155) 
(ज) जहां अनु 360 के अधीन वित्तीय आपात की घोषणा की गई है वहां केंद्र की शक्ति का विस्तार हो जाता है| केंद्रीय निर्देश दे सकता है कि सभी धन विधेयक और कुछ अन्य विधेयक राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित किए जाएं|
(झ) अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन केंद्र करता है| केंद्र को ही उच्च सेवा में नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती और सेवाओं की शर्तों को विनियमित करने की शक्ति है| किंतु ऐसे व्यक्ति जिस राज्य के काडर में होते हैं उसी राज्य द्वारा उन्हें वेतन दिया जाता है और वह उसी राज्य की सेवा करते हैं| इस प्रकार केंद्र राज्य की नौकरशाही पर भी कुछ नियंत्रण रखता है|
(ञ) राष्ट्रपति राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल और कुछ अन्य अधिकारियों के परामर्श से करता है| इनकी नियुक्ति में राज्य की भूमिका बहुत सीमित होती है|
(ट) अमेरिकी परिसंघवाद का एक आवश्यक लक्षण लिया है कि सीनेट में सभी राज्यों का समान प्रतिनिधित्व है चाहे उनकी जनसंख्या या क्षेत्रफल कुछ भी है| या छोटे राज्यों के लिए सुरक्षा उपाय माना जाता है| भारत में सदस्यों की संख्या जनसंख्या के आधार पर 1 से लेकर 34 तक है| इसके अतिरिक्त 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा निर्वाचित होते हैं|
(ठ) यहां पर परिसंघ और अधिसंघ, इंदौर विभिन्न किंतु संबंधित संकल्पना को समझने का प्रयास करना उचित होगा|
1 परिषद केंद्र और राज्य इन दो  इकाइयों के बीच एक घनिष्ठ विधिक संबंध है| केंद्र केवल एक होगा किंतु राज्य दो से अधिक कितने भी हो सकते हैं| अधिसंघ दो या अधिक प्रभुत्व संपन्न राज्यों का शिथिल संगम होता है  जिसका जन्म किसी संधि से होता है|
2. परिसंघ सामान्यतया अविनाशी होता है और राज्य को विलग होने का अधिकार नहीं होता| अमेरिका, भारत, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में ऐसा ही है| अधिसंघ का बंधन शिथिल होता है और राज्य विलग हो सकते हैं|
3. परिसंघ प्रभुत्व संपन्न निकाय और अंतरराष्ट्रीय व्यक्ति होता है अर्थात ऐसा व्यक्ति जो अंतरराष्ट्रीय विधि द्वारा मान्य है| अधिसंघ अंतरराष्ट्रीय व्यक्ति नहीं होता| वह प्रभुत्व संपन्न निकाय भी नहीं होता| अभी संघ के प्रमुख घटक राज्य प्रभुत्वान होते हैं  और अंतर्राष्ट्रीय विधि में उनकी स्वतंत्र प्रस्थिति होती होती है|
4. परिसंघ में व्यक्ति और परिसंघ के बीच एक विधिक संबंध होता है जिसे नागरिकता कहते हैं| आधिसंघ में लोग राज्य के नागरिक होते हैं|अधिसंघ  के नहीं|
राजनीतिक घटनाओं का अवलोकन करने पर यह प्रतीत होता है कि राज्य केंद्र के अभिकर्ता या उपकरण नहीं है| सुदृढ़ केंद्र की ओर से झुकाव होते हुए भी राज्य अपने अधिकार पर बल देते रहे हैं| कर्नाटक और महाराष्ट्र तथा पंजाब और हरियाणा के बीच राज्य क्षेत्र के विवाद हुए हैं| कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच नदी जल के हिस्से को लेकर विवाद हुए हैं| नागालैंड त्रिपुरा और मणिपुर ने एक दूसरे की भूमि पर दावा किया है|
परिसंघ की विद्यमान नेता के समर्थन में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि विभिन्न राज्यों में विभिन्न दलों का शासन है| पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चा ने अनेक बार सरकार बनाई है| मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश,और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने शासन किया है| तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में स्थानीय दल लंबे समय से सरकार बनाते रहे हैं| ओरिया तब होता रहा है जब केंद्र में कोई भिन्न दल या गठबंधन शासन कर रहा था|
लोगों की आकांक्षाओं की पूर्ति में परिसंघ सक्रिय रहा है इसलिए नए राज्यों की सृजन की मांग होती रहती है| 1950 के संविधान में 9 भाग क राज्य थे और 5 भाग ख राज्य थे| भाग ख राज्यों के उत्सादन के पश्चात  आज राज्यों की कुल संख्या 28 है|
एक और साक्ष्य है कि केंद्र से अनुदान प्राप्त करने के लिए बहुत खींचतान होती है और बार-बार इस बात पर बल दिया जाता है की विधि और व्यवस्था से संबंधित विषयों पर राज्यों को पूर्ण अधिकार है| केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को अनुच्छेद 280 के अधीन नियुक्त वित्त आयोग की सिफारिश से भी अधिक अनुदान दिए हैं|
विदेशी लेखकों की जो भी कुशंकाएं रही हो हमारे अपने विद्वान सही साबित हुए हैं और भारत में परिसंघ सिद्धांत को देखा और अनुभव किया जा सकता है| परिसंघ हमारी राज व्यवस्था में विद्यमान है और हमें उसकी जीवन ऊर्जा का अनुभव होता है|

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