डॉक्टर खरे बनाम इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया

डॉक्टर खरे बनाम इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया
इस मामले में डॉक्टर खरे ने 1957 में होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव को इस आधार पर स्थगित करने के लिए न्यायालय में याचिका दाखिल की कि पंजाब और हिमाचल प्रदेश के विधान मंडलों में कुछ स्थान खाली थे इस प्रकार अनुच्छेद 54 और 55 के अनुसार निर्वाचक मंडल पूर्ण होने की स्थिति मैं इस इलेक्शन को स्थगित किया जाना चाहिए । न्यायालय ने पेटीशनर की याचिका को खारिज करते हुए निर्णय दिया कि राष्ट्रपति के राष्ट्रपति के इलेक्शन पर आपत्ति करने वाली कोई भी याचिका केवल उस चुनाव के पूरे होने के बाद ही स्वीकार की जा सकती है यानी कि जबकि कोई उम्मीदवार निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है । यदि ऐसा ना हो तो राष्ट्रपति का चुनाव 5 वर्ष तक रुका रह सकता है जो अनुच्छेद 62 के खिलाफ है । खंड 4 जो इस अनुच्छेद में संविधान के 11 वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया है यह बताता है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के इलेक्शन पर इस आधार पर आपत्ति नहीं की जा सकती है कि उसके चुनाव करने वाले निर्वाचक मंडल के सदस्य में किसी कारण से स्थान कुछ खाली हैं ।  निर्वाचन पूर्ण हो जाने के पश्चात डॉक्टर खरे ने राष्ट्रपति के इलेक्शन की विधि मान्यता को चुनौती दी न्यायालय ने उसकी इस याचिका को भी खारिज कर दिया । माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत किसी चुनाव पर आपत्ति हो तो ऐसे इलेक्शन में या तो उम्मीदवार उस पर आपत्ति कर सकते हैं या 10 से अधिक मतदाता आपत्ति कर सकते हैं क्योंकि डॉक्टर खरे ने तो कोई उम्मीदवार थे और ना ही मतदाता इसलिए उन्हें याचिका दाखिल करने का कोई अधिकार नहीं है ।

Comments

Popular posts from this blog

संविधान की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख | Characteristics of the Constitution of India

भारतीय संविधान से संबंधित 100 महत्वपूर्ण प्रश्न उतर

संविधान के अनुच्छेद 19 में मूल अधिकार | Fundamental Right of Freedom in Article 19 of Constitution